8 टिप्पणियाँ

T-17/39 थी किस बला की धूप कहीं अब्रे-तर न था-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

साहिबो 31 को आख़िरी पोस्टिंग होना थी. आज इरशाद साहब के फोन के बाद आसिफ़ अमान साहब का ईमेल आया तो मुझे अपनी दूसरी ग़लती का अहसास हुआ. मनोज मित्तल ‘कैफ़’ की तरही ग़ज़ल तो 10-12 दिन पहले मेरे पास आ गयी थी. इस ग़ज़ल पर कुछ अदबी गुफ्तगू भी हुई फिर मैं मसरूफ़ियत के सबब इसे भी भूल गया और पोस्ट नहीं कर सका. इनकी मेहनत मेरी ग़लती के सबब ज़ाया नहीं होनी चाहिए. मैं आप सब से मुआफी का तलबगार हूँ. बराहे-करम इस ग़ज़ल को तरही में शुमार कीजिये. क़ुसूरवार तुफ़ैल चतुर्वेदी

थी किस बला की धूप कहीं अब्रे-तर न था
तन्हा सफ़र में कोई मिरा हमसफ़र न था

ज़िंदा था हँस रहा था मगर बेख़तर न था
महफ़ूज़ इस दयार में कोई बशर न था

हम ज़िन्दगी की राह में भटके तो क्या अजब
कोई निशान भी तो कोई मोड़ पर न था

उसके दिलो-दिमाग़ में रहते थे रात-दिन
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

तन्हाइयों में याद भी कुछ दूर ही रही
तू या तिरा ख़याल कभी मोतबर न था

देखा कि जिस उमीद से लौटा वतन को मैं
दीवारो-दर के बीच मिरा अब वो घर न था

वुसअत मिरे मज़ाक़ो-तमन्ना की और थी
यूँ दाइरा जहाँ का कोई मुख़्तसर न था

लाखों तो अपने हाथ से हमने गिरा दिये
जो टूट कर गिरा है वो पहला शजर न था

तोडा गया न ‘कैफ़’ से वाद निबाह का
चलना पड़ा अगरचे हमारा सफ़र न था

मनोज मित्तल ‘कैफ़’ 0887099295

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

8 comments on “T-17/39 थी किस बला की धूप कहीं अब्रे-तर न था-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

  1. खूबसूरत अश’आर हुए हैं मनोज साहब, दाद कुबूल करें।

  2. बढ़िया ग़ज़ल हुई बधाई.

  3. थी किस बला की धूप कहीं अब्रे-तर न था
    तन्हा सफ़र में कोई मिरा हमसफ़र न था
    शिद्दद्ते अहसास से उपजा है मतला !!
    हम ज़िन्दगी की राह में भटके तो क्या अजब
    कोई निशान भी तो कोई मोड़ पर न था
    आखिर को थक के बैठ गई इक मुकाम पर
    कुछ दूर मेरे साथ चली रहगुज़ार भी –शिकेब
    उसके दिलो-दिमाग़ में रहते थे रात-दिन
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    अप्रेम कथा –पारो देवदास !!
    तन्हाइयों में याद भी कुछ दूर ही रही
    तू या तिरा ख़याल कभी मोतबर न था
    एक शेर अकील नोमानी का — लगता है कहीं प्यार मे थोड़ी सी कमी थी
    और प्यार मे थोड़ी सी कमी कम नहीं होती –अक़ील नोमानी
    तू या तिरा ख़याल कभी मोतबर न था—प्यार मे थोड़ी सी कमी का संकेतक है !!!
    देखा कि जिस उमीद से लौटा वतन को मैं
    दीवारो-दर के बीच मिरा अब वो घर न था
    आइना वही रहता है !! सूरते बदल जाती हैं !! हमारी गैरहाजिरी घर की तस्वीर बदल देती है !!!
    वुसअत मिरे मज़ाक़ो-तमन्ना की और थी
    यूँ दाइरा जहाँ का कोई मुख़्तसर न था
    चाहिये और कुछ वुस अत मेरे बयाँ के लिये ग़ालिब !!!
    लाखों तो अपने हाथ से हमने गिरा दिये
    जो टूट कर गिरा है वो पहला शजर न था
    शजर महज पेड़ ही नहीं है यहाँ पर हर उस किरदार का प्रतीक भी है जो सम्ष्टि /कुदरत ने हमारे श्रेष्ठ और शुभ के लिये हमें बख़्शा है ! इसमे –कई काइनाती मनाज़िर शुमार हैं –लेकिन हम , हमें साया देने वाले हमें फल देने वाले हमें धूप की शिद्दत से बचने वाले इन किरदारों के प्रति बेपरवाह और निरनुश भी हैं !! उम्दा शेर कहा है
    तोडा गया न ‘कैफ़’ से वाद निबाह का
    चलना पड़ा अगरचे हमारा सफ़र न था
    ज़िन्दगी एक अनमना सफर है !! वफा एक बेहद कठिन मरहला है !!
    मनोज मित्तल ‘कैफ़’ साहब बहुत खूब बहुत खूब –ग़ज़ल के लिये बधाई !! –मयंक

  4. kaif sahab.. kya hi acchi ghazal kahi hai aapne.. matla behad umda hai…girah bhi khhub lagai hai apne… aur
    देखा कि जिस उमीद से लौटा वतन को मैं
    दीवारो-दर के बीच मिरा अब वो घर न था
    ye she’r bhi khub pasand aaya.. dher saari daad…

  5. आसिफ़,

    मुहब्‍बत का शुक्रिया। ये मेरी नहीं बल्कि – जो अदा हुई मेरे नुत्‍क़ से ये उसी ज़बान की शान है।

  6. मोहतरम मनोज कैफ साहब ग़ज़ल तो कईं रोज़ पहले सुन चूका हूँ आपसे | तब भी मज़ा आ गया था सुनकर और अब भी मज़ा आ गया पढकर.. सभी शेर बेहद उम्दा हैं लेकिन यें शेर तो कमाल हैं…

    हम ज़िन्दगी की राह में भटके तो क्या अजब
    कोई निशान भी तो कोई मोड़ पर न था

    तन्हाइयों में याद भी कुछ दूर ही रही
    तू या तिरा ख़याल कभी मोतबर न था

    देखा कि जिस उमीद से लौटा वतन को मैं
    दीवारो-दर के बीच मिरा अब वो घर न था

    वुसअत मिरे मज़ाक़ो-तमन्ना की और थी
    यूँ दाइरा जहाँ का कोई मुख़्तसर न था

    लाखों तो अपने हाथ से हमने गिरा दिये
    जो टूट कर गिरा है वो पहला शजर न था

    तोडा गया न ‘कैफ़’ से वादा निबाह का
    चलना पड़ा अगरचे हमारा सफ़र न था

    दिली मुबारकबाद!! # आसिफ

    • मयंक अवस्‍थी जी,
      आपकी दाद का शुक्रिया। मैं मानता हूं कि शै’र फ़हम की चिंगारी को केवल एक हवा देता है और पढ़ने वाला अपने तरीक़े से उसे अपनाता है। यही सुख़नफ़हमी है। ये ख़ुश कि़स्‍मती है कि मेो शै’र आप तक पहुंचे।

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: