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T-17/38 दरपेश उसके बाद कोई और सफ़र न था-अमीर इमाम

साहिबो 31 को आख़िरी पोस्टिंग होना थी. आज इरशाद साहब का फोन आया तो मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ. अमीर इमाम साहब की तरही ग़ज़ल तो 10-12 दिन पहले मेरे पास आ गयी थी मगर मैं बला की मसरूफ़ियत के चलते भूल गया और इसे पोस्ट नहीं कर सका. इनकी मेहनत मेरी ग़लती के सबब ज़ाया नहीं होनी चाहिए. मैं आप सब से मुआफी का तलबगार हूँ. बराहे-करम इस ग़ज़ल को तरही में शुमार कीजिये. क़ुसूरवार तुफ़ैल चतुर्वेदी

दरपेश उसके बाद कोई और सफ़र न था
हाँ ये हुआ कि अब मिरे शानों पे सर न था

आया था मुझसे करने मुलाक़ात मेरा घर
क़िस्मत ने ये किया कि मैं उस रोज़ घर न था

कोई ग़ुबार और न गर्मी न वो घुटन
यारो हवा का आज कोई हमसफ़र न था

मेरे तमाम ख़ाब बुलाते रहे मुझे
दीवारे-शब में दूर तलक कोई दर न था

कहती रही नज़र कि नहीं कोई आइना
आईना कह रहा था कि ज़ौक़े-नज़र न था

उसको भी लग रहा था कि कोई उधर नहीं
मुझको भी लग रहा था कि कोई इधर न था

अमीर इमाम 09997759196

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6 comments on “T-17/38 दरपेश उसके बाद कोई और सफ़र न था-अमीर इमाम

  1. बहुत खूब इमाम साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए।

  2. अमीर इमाम साहब बहुत उम्दा ग़ज़ल कही. ढेरों दाद

  3. अमीर इमाम साहब,

    मेरे तमाम ख़ाब बुलाते रहे मुझे
    दीवारे-शब में दूर तलक कोई दर न था

    कहती रही नज़र कि नहीं कोई आइना
    आईना कह रहा था कि ज़ौक़े-नज़र न था

    ग़ज़ल अपनी जगह, इन शै’रों की दाद अलग से।

  4. ameer imaam sahab… bharpoor ghazal hui hai….
    कोई ग़ुबार और न गर्मी न वो घुटन
    यारो हवा का आज कोई हमसफ़र न था

    मेरे तमाम ख़ाब बुलाते रहे मुझे
    दीवारे-शब में दूर तलक कोई दर न था

    कहती रही नज़र कि नहीं कोई आइना
    आईना कह रहा था कि ज़ौक़े-नज़र न था
    aur ye teen she’r to behad pasand aaye..daad qubulen… lafz par shayad pahli baar padh raha hun aapko.. aapki doosri ghazalon ka bhi intezar rahega….

  5. दरपेश उसके बाद कोई और सफ़र न था
    हाँ ये हुआ कि अब मिरे शानों पे सर न था
    अस्तित्व के संघर्ष अना के संघर्ष ही हैं !! मनुष्यत्व की गरिमा –समय की विसंगतियों के खिलाफ मर्यादाओं के सम्मान हेतु दी गई शहादतें से ही काइम रही है –शानो पे सर का होना –आपकी पहचान और आपके आत्म सम्मान की शिनाख़्त है –लिहाजा यदि शानो पे सर ही नहीं है तो वज़ूद रायगाँ हो गया – बहुत सुन्दर मतला है !!!
    आया था मुझसे करने मुलाक़ात मेरा घर
    क़िस्मत ने ये किया कि मैं उस रोज़ घर न था
    मेरा घर यानी मेरे खून मे शुमार मेरी सम्वेदनायें –नेरे जज़्बात की मंज़िले मक़्सूत जब उपलब्ध हुईं तन मेरी मस्रूफियत ने यह लम्हा मेरे नाम से मंसूब नहीं होने दिया—अलमीया है ये । नक़्श इलहाबादी कानपुर का शेर है —
    जिसेक रोज़ मेरी रूह् मिलने आई थी
    ब इत्तेफाक़ मैं अपने बदन से बाहर था –नक़्श इलहाबादी कानपुर
    कोई ग़ुबार और न गर्मी न वो घुटन
    यारो हवा का आज कोई हमसफ़र न था
    हवा –से तआल्लुक –फ़िज़ाँ के स्ंक्रमण और उस माहौल से है जिसमे हम गुज़र कर जी रहे हैं – हमारा महौल कोई अच्छी अनुभूति नहीं देता – गुबार गर्म्र्र घुटन हब्स यही हवा के हमराह दीख पड़ते हैं – बहुतख़ूब !!!
    मेरे तमाम ख़ाब बुलाते रहे मुझे
    दीवारे-शब में दूर तलक कोई दर न था
    क्या प्यारा शेर है !! मेरी उमीदें –जीवन की विसंगतियों के चलते कभी मंज़िल नहीं पा सकीं – बहुत सुन्दर बहुत सुन्दर !!!
    कहती रही नज़र कि नहीं कोई आइना
    आईना कह रहा था कि ज़ौक़े-नज़र न था
    मीर साहब का शेर है — चश्म हो तो आइनाख़ाना है दहर
    मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच –मीर तकी मीर
    लिहाजा सच से बाबस्तग़ी !! सच के कहत के कारन नहीं बीनाई के आभाव के सबब भे होती है !!
    उसको भी लग रहा था कि कोई उधर नहीं
    मुझको भी लग रहा था कि कोई इधर न था
    अगर ऊला सानी मे उधर इधर को बदल दिया जाय !! तो शेर इस शेर को हमाअहंग करता महसूस होगा !!
    उसे गुमाँ कि मैं आवाज़ दे के लौट गया
    मुझे यकीन कि वो मेरा यार घर मे था –क़ैफी विज़्दानी

    लेकिन जिस हिसाब से ये अल्फाज़ इस्तेमाल किये गये हैं उससे फराज़ के इस शेर के नज़दीक़ का अर्थ निकलता है –
    अब न मैं हूँ न वो तू है न वो माज़ी है फ़राज़
    जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबो मे मिले –अहमद् फराज़
    अमीर इमाम साहब !! ये ग़ज़ल न पब्लिश होती तो ये मुशाइरा अधूरा रहता !! क्या कमाल की फिक्र है क्या कमाल का इज़हार है और क्या शफ़्फाफ पानियों जैसा बयान है – समन्दर जैसा गहरा !! इसे गज़ल कहते हैं वाह !!! –मयंक

  6. chust durust ghazal
    ameer imam sahab daad qubool kare…

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