9 Comments

T-17/37 आंगन जो बँट गया तो वो पहले सा घर न था-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी

आंगन जो बँट गया तो वो पहले सा घर न था
कोई भी अब किसी के लिये मोतबर न था

जो मोम को भी सख्त चटानों में ढाल दे
पिछली सदी के लोगों में ऐसा हुनर न था

इक ख़ौफ़ था जो ले गया शक्लों को छीन कर
बस भीड़ ही थी भीड़ में कोई बशर न था

हम उनके दरमियान किताबों से खुल गये
जिनमें हुरूफ़ पढने का कोई हुनर न था

किसने नदी की राह को रोका है इन दिनों
पहले हमारा घर कभी पानी का घर न था

उस बार ज़िन्दगी को नये रस्ते मिले
जिस बार मेरे साथ मीरा राहबर न था

वो दोपहर थी चाँद की शायद इसीलिये
उस पर कभी थकान का कोई असर न था

उसकी उदास आँखों में रहते रात दिन
उसके सिवा हमारा कहीं कोई घर न था

होने लगीं थीं ख़ून में जुगनू की बारिशें
वो साथ-साथ था तो अँधेरे का डर न था

चहरे को ओढनी से छिपाया था किस लिये
आरिज़ पे कोई दांत का टीका अगर न था

साहिल पे ही रुकी रहीं यादों की कश्तियाँ
आँखें हुईं जो खुश्क तो कोई सफ़र न था

खोया हुआ था अपने ख़यालों की भीड़ में
हमराह था ज़ुरूर मगर हमसफ़र न था

दिल की सड़क पे मील के पत्थर तो थे मगर
इस रस्ते पे कोई भी आरामघर न था

हमने सभी पे रौशनी छिड़की थी कल मगर
बस्ती में अपनी कोई भी अहले-नज़र न था

ठोकर लगा रहे थे किसी पांव के निशां
पत्थर तो कोई आज सरे-रहगुज़र न था

इतवार की हथेली भी छालों से पुर मिली
दिन कौन सा था जो कि पसीने से तर न था

मय की पियालियों में खनकती रही है सुब्ह
इनके सिवा कहीं पे भी रंगे-सहर न था

अपमान अपने-अपने पतों पर पहुँच गये
हालाँकि उनका कोई कभी राहबर न था

दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी 09997220102

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

9 comments on “T-17/37 आंगन जो बँट गया तो वो पहले सा घर न था-दिनेश कुमार स्वामी ‘शबाब’ मेरठी

  1. “आरिज़ पे कोई दांत का टीका अगर न था”
    क्या Scene बना है !
    कमाल किया साहब !
    और ये कि ” जिनमें हरुफ़ पढ़ने का कोई हुनर न था”
    ग़ज़ब है, क़हर है !

  2. खूबसूरत ग़ज़ल हुई है शबाब साहब, दाद कुबूल कीजिए

  3. ‘शबाब’ मेरठी साहब,

    ये अशआर बहुत पसंद आए-

    हम उनके दरमियान किताबों से खुल गये
    जिनमें हुरूफ़ पढने का कोई हुनर न था

    उसकी उदास आँखों में रहते रात दिन
    उसके सिवा हमारा कहीं कोई घर न था

    होने लगीं थीं ख़ून में जुगनू की बारिशें
    वो साथ-साथ था तो अँधेरे का डर न था

    खोया हुआ था अपने ख़यालों की भीड़ में
    हमराह था ज़ुरूर मगर हमसफ़र न था

    दिल की सड़क पे मील के पत्थर तो थे मगर
    इस रस्ते पे कोई भी आरामघर न था

    मय की पियालियों में खनकती रही है सुब्ह
    इनके सिवा कहीं पे भी रंगे-सहर न था

    और आरामघर का क़ाफि़या, वाह वाह।

  4. aadarneey shabab sahab… kya hi umda ghazal hai… har she’r lajwaab hai…
    इक ख़ौफ़ था जो ले गया शक्लों को छीन कर
    बस भीड़ ही थी भीड़ में कोई बशर न था

    होने लगीं थीं ख़ून में जुगनू की बारिशें
    वो साथ-साथ था तो अँधेरे का डर न था

    दिल की सड़क पे मील के पत्थर तो थे मगर
    इस रस्ते पे कोई भी आरामघर न था

    ठोकर लगा रहे थे किसी पांव के निशां
    पत्थर तो कोई आज सरे-रहगुज़र न था

    इतवार की हथेली भी छालों से पुर मिली
    दिन कौन सा था जो कि पसीने से तर न था

    ye paanch she’r to shayad aaj raat sone nahi denge… kya hi umda she’r hain..waah waah… aur khoon men jugnu ki barishen…. soch se pare kee cheez hai.. adbhut hai… daad qubulen..

  5. हमेशा की तरह बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है शबाब साहब! भरपूर दाद!

  6. इक ख़ौफ़ था जो ले गया शक्लों को छीन कर
    बस भीड़ ही थी भीड़ में कोई बशर न था

    हम उनके दरमियान किताबों से खुल गये
    जिनमें हुरूफ़ पढने का कोई हुनर न था
    आ. दिनेश सा. बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है ,बधाई स्वीकार करे
    सादर

  7. दुष्यंत के समय मे भी शबाब मेरठी साहब सारिका , धर्मयुग और समकालीन साहित्यिक मैगज़ीनो मे छाये रहते थे और तब भी लोग इंतज़ार करते थे कि अगला अंक आये और शबाब साहब का कलाम पढने को मिले !!! उन्होंने फिल्मो मे भी गीत लिखे हैं और एक फिल्म जिसमे अमिताभ बच्चन है उसमे एक गीत शबाब साहब का लिखा हुआ अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया है –इस फिल्म का मै इंतज़ार कर रहा हूं !!
    शबाब साहब !! बहुत देर लगी आपको आने में लेकिन 18 अशार की बड़ी सौगात ले कर आये हैं इसलिये पुरानी कहावत सही साबित हुई कि धैर्य का फल मीठा होता है!!
    आंगन जो बँट गया तो वो पहले सा घर न था
    कोई भी अब किसी के लिये मोतबर न था
    1947 मे आँगन बँट गया था !! आज हालात ज़ाहिर हैं !!
    जो मोम को भी सख्त चटानों में ढाल दे
    पिछली सदी के लोगों में ऐसा हुनर न था
    बहुत खूबसूरती से बात कही है !! अब जज़्बात का गुज़र नहीं है !! भावना “शब्द” अजनबी शै का नाम है पहले –ऐसा कहत नहीं था –इंसानियत का जज़्बात का खुलूस का और संवेदना का – ये हमारी आज की यांत्रिक ज़िन्दगी की देन है !!!
    इक ख़ौफ़ था जो ले गया शक्लों को छीन कर
    बस भीड़ ही थी भीड़ में कोई बशर न था
    भय ने लोगों से उनका किरदार छीन लिया है क्या खूब ऊला मिसरा है इस शेर का !!
    हम उनके दरमियान किताबों से खुल गये
    जिनमें हुरूफ़ पढने का कोई हुनर न था
    ज़र्रा भी हम जैसे तनहाई मे मुंतज़िर लोगों को आफताब लगता है –लिहाजा कैसे कैसे लोगों को हमने अपनी पीड़ा सुना डाली !!!वाह !!
    किसने नदी की राह को रोका है इन दिनों
    पहले हमारा घर कभी पानी का घर न था
    ये शेर मुझपर खुला नही !!!
    उस बार ज़िन्दगी को नये रस्ते मिले
    जिस बार मेरे साथ मिरा राहबर न था
    रहबर का मकसद आजकल आपको अपने पीछे चलाने के सिवा और कुछ शायद नहीं होता है !! आवारगी और भटकन ही कोई नई सम्त खोल सकती है!!
    वो दोपहर थी चाँद की शायद इसीलिये
    उस पर कभी थकान का कोई असर न था
    ये शेर भी मुझपर खुला नही !!!
    उसकी उदास आँखों में रहते रात दिन
    उसके सिवा हमारा कहीं कोई घर न था
    बहुत सुन्दर शेर है !!! एक दूजे को हासिल नहीं हो सके लेकिन किसी की चाहत में शुमार थे –यही क्या कम था !! वाह !!
    होने लगीं थीं ख़ून में जुगनू की बारिशें
    वो साथ-साथ था तो अँधेरे का डर न था
    लहू मे शरार था – तश्बीह खूब है !!!!
    चहरे को ओढनी से छिपाया था किस लिये
    आरिज़ पे कोई दांत का टीका अगर न था
    अँय !! दइया !! बहुतै नटख़ट शेर कहा है !!
    साहिल पे ही रुकी रहीं यादों की कश्तियाँ
    आँखें हुईं जो खुश्क तो कोई सफ़र न था
    चश्मे पुरअश्क !! लेकिन ज़ब्त ने अपना काम किया !! आँसू उमड़ रहे थे लेकिन हम उन्हें पी गये इसलिये यादो का सिल्सिला आगे नहीं बढा !! खूब !! एक शेर
    मैं आँसू पी गया हूँ इसलिये आँखों मे बंज़र है
    नदी सहरा जी जानिब मुड़ रही थी मुड़ नहीं पाई –मयंक
    हमने सभी पे रौशनी छिड़की थी कल मगर
    बस्ती में अपनी कोई भी अहले-नज़र न था
    तिरी किरनो के आने तक यहाँ जुगनू चमकते थे
    ये बस्ती मुफ़लिसों की थी तिरी जागीर होने तक –मयंक
    ठोकर लगा रहे थे किसी पांव के निशां
    पत्थर तो कोई आज सरे-रहगुज़र न था
    बहुत अच्छा शेर – कोई इसी रहगुज़र पर हमसे पहले गुज़रा –उसका
    इतवार की हथेली भी छालों से पुर मिली
    दिन कौन सा था जो कि पसीने से तर न था
    अब कोई दिन फुर्सत का नहीं है !! ज़िन्दगी को रोज़गार की मस्रूफियत खा गई है !!
    मय की पियालियों में खनकती रही है सुब्ह
    इनके सिवा कहीं पे भी रंगे-सहर न था
    कोई सार्थक दिशा नहीं है –जिसमे सुबह या नई दिशा को अबाद किया जा सके …
    अपमान अपने-अपने पतों पर पहुँच गये
    हालाँकि उनका कोई कभी राहबर न था
    आपकी आलोचना पंख लगा कर अपना सफर तय करती है जो कि एक अद्भुत किंतु कड़वा सत्य है बहुत खूब शबाब साहब !!!बहुत खूब !!!
    ‘शबाब’ साहब बहुत कुछ गज़ल मे दिया है आपने मिसाल के तौर पर — इतवार की हथेली– ठोकर लगाते हुये किसी पांव के निशां– सभी पे रौशनी छिड़की थी— आरिज़ पे कोई दांत का टीका– जुगनू की बारिशें– मोम को भी सख्त चटानों में ढालना –गज़ल आबाद रहेगी –जब तक असातिज़ा हैं —मयंक

  8. इस ग़ज़ल ने तो नि:शब्द कर दिया।

    पिछली सदी के लोगों में ऐसा हुनर न था इस मिसरे का तन्ज़ तो……उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़….

    तरही ग़ज़लों में रचनातमकता और दोहराव में फ़र्क़ स्पष्ट दर्शाती इस ग़ज़ल के लिए
    करोड़ों बार दाद !!!!

  9. बला की खूबसूरत ग़ज़ल …सभी शेर ज़बरदस्त…चौंका देने वाली उपमाएं मसलन “चाँद की दोपहर”,खून में जुगनूँ की बारिश”…आह
    वाह वाह वाह वाह
    निशब्द हो गया हूँ दादा
    इस खूबसूरत गज़ल के लिए आपको करोड़ों दाद
    With my best regards

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: