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T17/34 अंधी सी इक डगर थी, कोई राहबर न था-देवेंद्र गौतम

अंधी सी इक डगर थी, कोई राहबर न था
हम उसको ढूंढते थे उघर, वो जिधर न था

इतना कड़ा सफ़र था कि रूदाद क्या कहें
हर सम्त सिर्फ़ धूप थी, कोई शज़र न था

अहबाब की कमी न थी राहे-हयात में
लेकिन तुम्हारे बाद कोई मोतबर न था

सुनने को सारे शहर की सुनते थे हम मगर
हम पर किसी की बात का कोई असर न था

रखते थे अपने दिल में बिठाकर उसी को हम
आखों के सामने जो कभी जल्वागर न था

दरिया में डूबने का सबब कोई तो बताय
कश्ती के आसपास तो कोई भंवर न था

हम जानते थे मौत ही मंज़िल है आख़िरी
हमको किसी डगर पे भटकने का डर न था

यूं तो वहां ख़ुलूस की कोई कमी न थी
उसकी गली में फिर भी हमारा गुज़र न था।

देवेंद्र गौतम 08860843164

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17 comments on “T17/34 अंधी सी इक डगर थी, कोई राहबर न था-देवेंद्र गौतम

  1. बहुत खूब गौतम साहब, दाद कुबूल कीजिए

  2. गौतम जी !! आपके कुछ शेर अन्य शाइरो से इस अर्थ मे भिन्न हैं कि या तो वो बहुत कुछ पाठको के सोचने पर छोड़ दिया गया है या पाठको के सोचने के लिये कुछ भी नहीं छोडा गया है –ये आपका अपना रंग है !!!
    अंधी सी इक डगर थी, कोई राहबर न था
    हम उसको ढूंढते थे उघर, वो जिधर न था
    क़यास ये है कि किसको ढूँढ रहे थे !!! – सत्य को , ईश्वर को , मंज़िल को या किसी अन्य शै को !!!
    इतना कड़ा सफ़र था कि रूदाद क्या कहें
    हर सम्त सिर्फ़ धूप थी, कोई शज़र न था
    यहाँ सोचने को कुछ भी नहीं बचा –सानी मिसरे ने साफ कर दिया कि सहरा का सफर था !!!
    अहबाब की कमी न थी राहे-हयात में
    लेकिन तुम्हारे बाद कोई मोतबर न था
    बहुत सुन्दर शेर है और काफिया चमक गया है !! जज़बात बहुत बारीक पैरहन पहन कर आये हैं लेकिन बहुत खूब !! दाद!!
    सुनने को सारे शहर की सुनते थे हम मगर
    हम पर किसी की बात का कोई असर न था
    सुनी सबकी करी अपने मन की !!
    रखते थे अपने दिल में बिठाकर उसी को हम
    आखों के सामने जो कभी जल्वागर न था
    अच्छा शेर है !!!
    दरिया में डूबने का सबब कोई तो बताय
    कश्ती के आसपास तो कोई भंवर न था
    मुआमला खुदकुशी का लगता है !!!
    यहाँ भी सवाल हावी है सोच पर कि जब कोई भँवर नहीं था तो कश्ती कैसे डूबी !! ये सवाल पूछ कर शाइर ने पाठ्को को सोचने के काम पर लगा दिया है !! एक शेर बशीर का है –
    कभी बरसात मे शादाब बेलें सूख जाती है
    हरे पेड़ो के गिरने का कोई मौसम नहीं होता –बशीर बद्र !!
    हम जानते थे मौत ही मंज़िल है आख़िरी
    हमको किसी डगर पे भटकने का डर न था
    मौत वो मंज़िले मक्सूत है जो खुद चल कर हम तक आ ही जाती है !!! खूब !!!
    यूं तो वहां ख़ुलूस की कोई कमी न थी
    उसकी गली में फिर भी हमारा गुज़र न था
    खुलूस पर्याप्त नहीं था – हमें कुछ और तवक्को थी!!
    गौतम जी !! आपको बहुत दिनो बाद पढ कर अच्छा लगा –मयंक

    • भाई मयंक अवस्थी जी
      आपने मेरे एक-एक शेर पर इतनी बारीक नज़र डाली। इसके लिए शुक्रगुज़ार हूं। मैं इस बात का ध्यान रखूंगा कि अपने शेरों में पाठकों के जिम्मे सोचने का काम ज्यादा न छोडूं।
      –देवेंद्र गौतम

  3. bahut bahut umda ghazal hui hai devendra ji… bharpoor….

    रखते थे अपने दिल में बिठाकर उसी को हम
    आखों के सामने जो कभी जल्वागर न था

    हम जानते थे मौत ही मंज़िल है आख़िरी
    हमको किसी डगर पे भटकने का डर न था
    in do she’ron par bataure khaas daad qubulen..

  4. दरिया में डूबने का सबब कोई तो बताय
    कश्ती के आसपास तो कोई भंवर न था
    वाह क्या खूब शेर हुआ है। बहुत बहुत बधाई गौतम साहब।

  5. देवेंद्र गौतम जी,

    ख़ूब ग़ज़ल कही है।मुबारक हो।

  6. अंधी सी इक डगर थी, कोई राहबर न था
    हम उसको ढूंढते थे उघर, वो जिधर न था…bharpur matla …umdaa ghazal

    अहबाब की कमी न थी राहे-हयात में
    लेकिन तुम्हारे बाद कोई मोतबर न था….wahh wahh. .Kya kehne

    -Kanha

  7. मर्मस्पर्शी ग़ज़ल है देवेन्द्र जी. बहुत दिनों बाद तशरीफ़ लाये आप. इस शेर का तो कहना ही क्या:
    अहबाब की कमी न थी राहे-हयात में
    लेकिन तुम्हारे बाद कोई मोतबर न था….’मोतबर’ इस से अच्छा किसी ने नहीं बाँधा. भरपूर दाद!

  8. khoobsoorat Ghaza aur us;ke is behad khoobsoorat sher ke liye hardik badhai:

    दरिया में डूबने का सबब कोई तो बताय
    कश्ती के आसपास तो कोई भंवर न था

  9. Dariya me doobne ka sabab koi to batay
    Kashti k aas pas to koi bhanwar n tha
    Kya kahne
    Bahut achhii gazal huii hai Devendra sahab
    Dili daad kubul keejiye
    With regards

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