13 टिप्पणियाँ

T-17/36 हालात से कोई भी वहाँ बेख़बर न था-अरविन्द असर

हालात से कोई भी वहाँ बेख़बर न था
लेकिन किसी के दिल पे ज़रा भी असर न था

पहले भी एक बार मिरे पास घर न था.
इस बार की तरह मैं मगर दर-ब-दर न था

चेहरा, निगाह, होंठ ही पढ़ता था वो मिरे
उसको भरोसा लफ़ज़ के किरदार पर न था

टी.वी. की उस डिबेट में चुप इसलिये रहे
हमको जो सच बताना था वो मुख़्तसर न था

कैसे कटी थी रात सफ़र में न पूछिये
कोई सराय तक न थी कोई खंडर न था

बच्चे के हाथ से बनी तस्वीर की तरह
इस दिल की चाहतों का भी कुछ पैर-सर न था

बस्ती गया तो पाया न इन्सान का वजूद
जंगल गया तो देखा कोई जानवर न था

सारे जहाँ में धूम हमारे हुनर की थी
उस पर हुनर हमारा मगर कारगर न था

फितरत हमारी आब सी होने के वावजूद
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुजर न था’

बाहर का रंग-रूप ही सब कुछ नहीं ‘असर’
जो सीप मेरे पास थी उसमें गुहर न था

अरविन्द असर 09871329522

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

13 comments on “T-17/36 हालात से कोई भी वहाँ बेख़बर न था-अरविन्द असर

  1. बाहर का रंग-रूप ही सब कुछ नहीं ‘असर’
    जो सीप मेरे पास थी उसमें गुहर न था

    शुभकामाएं हुज़ूर…

  2. बहुत खूब अरविन्द साहब, दाद कुबूल कीजिए

  3. हालात से कोई भी वहाँ बेख़बर न था
    लेकिन किसी के दिल पे ज़रा भी असर न था
    संवेदनाविहीन समाज का चित्र है !!!
    पहले भी एक बार मिरे पास घर न था.
    इस बार की तरह मैं मगर दर-ब-दर न था
    अब की ग़ुर्बत और भटकन –अगले वक़्त से ज़ियादा तल्ख़ है !!1
    चेहरा, निगाह, होंठ ही पढ़ता था वो मिरे
    उसको भरोसा लफ़ज़ के किरदार पर न था
    परख़ना मत, परखने मे कोई अपना नहीं रहता
    किसी भी आइने मे देर तक चेहरा नहीं रहता –बशीर
    बच्चे के हाथ से बनी तस्वीर की तरह
    इस दिल की चाहतों का भी कुछ पैर-सर न था
    तश्बीह सुन्दर है !! राजेश रेड्डी का एक शेर — दिल उसी ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
    या इसे चाहिये सब कुछ ही या कि कुछ भी नहीं
    बस्ती गया तो पाया न इन्सान का वजूद
    जंगल गया तो देखा कोई जानवर न था
    सारे दायरे अपना अपना मर्कज़ खो रहे हैं !!
    फितरत हमारी आब सी होने के वावजूद
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुजर न था’
    नई गिरह और सुन्दर गिरह !!
    बाहर का रंग-रूप ही सब कुछ नहीं ‘असर’
    जो सीप मेरे पास थी उसमें गुहर न था
    अब ये बता कि रूह के शोले का क्या है रंग
    मरमर का ये लिबास तो सुन्दर लगा मुझे –शिकेब
    अरविन्द असर साहब आपकी गज़ल पुर असर है बधाई !!! –मयंक

  4. arvind ji….lafz par aapko pahli baar padh raha hun.. aur behad khush hun ki aapko padh paya..swagat hai aapka… bahut hi umdaa ghazal hui hai… kai sher behad naye lage… girah kamaal ki hai…. behad ala….

    बच्चे के हाथ से बनी तस्वीर की तरह
    इस दिल की चाहतों का भी कुछ पैर-सर न था

    btaure khaas is she’r par daad qubul karen… halanki meri jankaari me muhawra ‘sar-pair’ ka hota hai..lekin phir bhi sher itna pasand aaya hai ki kya kahun/… daad qubulen

    • स्वप्निल जी हौसला अफजाई का शुक्रिया.आपने ठीक कहा है, मुहावरा सर-पैर ही है,मै मानता हूं इसका गलत प्रयोग हुआ है’ लेकिन मेरे पास कोई विकल्प न था, इस शेर को रखा जाय या नही मैं और लोगो से भी सुझाव चाहता हूं.

  5. पहले भी एक बार मिरे पास घर न था.
    इस बार की तरह मैं मगर दर-ब-दर न था
    Touched my heart !!!!!

  6. बाहर का रंग-रूप ही सब कुछ नहीं ‘असर’
    जो सीप मेरे पास थी उसमें गुहर न था
    वाह अरविन्द साहब बहुत खूब, इक खुला अंदाज़। गिरह भी बहुत खूब लगी है। ढेरों दाद।

  7. एक जुदा अंदाज़ में …भरपूर ग़ज़ल
    टी.वी.के डिबेट वाली बात बिलकुल सही लगती है
    और
    बच्चों के हाथ से बनी तस्वीर की तरह
    इस दिल की चाहतों का भी कुछ पैर सर न था
    बहुत ही मासूम सा शेर है
    सभी शेर ही उम्दा है अरविन्द जी
    इस प्यारी सी ग़ज़ल के लिये दिली दाद कुबूल कीजिये

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: