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T-17/31 हम लाख चाहते भी तो इससे मफ़र न था-अभय कुमार ‘अभय’

हम लाख चाहते भी तो इससे मफ़र न था
बेकैफ़ धड़कनों का सफ़र बेसफ़र न था

छूने को आसमान ही सर पर न था कहीं
वरना बिसात भर तो मैं बेबालो-पर न था

हम वा तो कर रहे थे दरे-दिल को बार-बार
उन दस्तकों पे नाम तुम्हारा मगर न था

बेशक ख़ता हुई कि तुम्हें अपना कह दिया
जुर्मे-वफ़ा क़ुबूल मगर जान कर न था

आँखों के बेशुमार सफ़ीने हुए हैं ग़र्क़
कहने को उसके जिस्म पे कोई भंवर न था

बाड़े-सबा हुए कभी शम्सो-क़मर हुए
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

आये हैं उस नज़र से बुलावे तो बार-बार
दिल ही से मेरे वास्ते हुक्मे-सफ़र न था

हों लाख या करोड़ मगर इब्तिदा है एक
दरिया तो हो न पता वो क़तरा अगर न था

क़दमों पे मसलिहत के कहीं ख़म जो हो गया
कांधों पे एक बोझ ‘अभय’ था वो सर न था

अभय कुमार ‘अभय’ 08171611298 -09897201820

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4 comments on “T-17/31 हम लाख चाहते भी तो इससे मफ़र न था-अभय कुमार ‘अभय’

  1. बहुत खूब अभय साहब, दाद कुबूलें

  2. हम लाख चाहते भी तो इससे मफ़र न था
    बेकैफ़ धड़कनों का सफ़र बेसफ़र न था
    दिल दा मामला है !!! इससे मफ़र कहाँ !! मुझे दिल की खता पर “यास” शर्माना नहीं आता // पराया ज़ुर्म अपने नाम लिखवाना नहीं आता !! यास यगाना चंगेज़ी !!! और तड़पूँगा उम्र भर दिले मरहूम के लिये // कम्बख़्त नामुराद लड़कपन का यार था !!!
    दोनो शेर कहने वाले समझदार थे !! दिल कौन सा अपने इख्तियार मे रहने वाली शै है?!! लिहाजा पतली गली से लोग निकल लिये –ख़ता दिल की है हमारा क्याकुसूर !! और लड़्कपन की दोस्ती थी इसके बाद दिल तो अल्विदाह कह गया और हम तन्हा रह गये !!
    बेकैफ़ धड़कनों का सफ़र…!!! बहुत खूब अभय साहब !!
    छूने को आसमान ही सर पर न था कहीं
    वरना बिसात भर तो मैं बेबालो-पर न था
    सुन्दर शेर कहा है !! कद आवर शाइर का बयान है!! आसमान की बुलन्दी को कम करने वाला !!!
    हम वा तो कर रहे थे दरे-दिल को बार-बार
    उन दस्तकों पे नाम तुम्हारा मगर न था
    जिसका इंतज़ार था –वो नहीं था दरे दिल पर !!
    कौन आया है यहाँ कोई न आया होगा
    मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा !! –कैफ भोपाली
    आँखों के बेशुमार सफ़ीने हुए हैं ग़र्क़
    कहने को उसके जिस्म पे कोई भंवर न था
    अच्छा शेर है और आँखो के सफीने से जिस्म के भँवर की रियायत पर जो अर्थ खुलता है वो बेहद साफ और स्पष्ट है लेकिन इसे नस्र करने पर भी शेर अपनी बात अपनी काव्यात्मकता मे ही कहता है –जब सानी मिसरे मे भी समांतर तश्बीह रहती है तो ऐसा अर्थ सौन्दर्य उत्पन्न होता है !! वाह !!
    बादे -सबा हुए कभी शम्सो-क़मर हुए
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    नई गिरह है और फब रही है !!
    आये हैं उस नज़र से बुलावे तो बार-बार
    दिल ही से मेरे वास्ते हुक्मे-सफ़र न था
    ज़ब्त, अना, दृढता,इस शेर की बुनियाद मे दीख पड़्ते हैं !!
    हों लाख या करोड़ मगर इब्तिदा है एक
    दरिया तो हो न पाता वो क़तरा अगर न था
    लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया !! काफिले आते गये हिन्दोस्ताँ बसता गया !! किसी भी शक्ति की बुनियादी शक्ति उसकी इकाइयाँ होती हैं !!! लेकिन इनका स्रोत एक ही है !!
    क़दमों पे मसलिहत के कहीं ख़म जो हो गया
    कांधों पे एक बोझ ‘अभय’ था वो सर न था
    काँधों पे सर का न होना !! अना के न होने और किसी व्यक्ति मे व्यक्तित्वहीनता के तईं शैरी मे इस्तेमाल किया जाता है !! ये शेर बहुत सुन्दर है –दोनो मिसरे अरूज़े फिक्रो –फन की नुमैन्दगी कर रहे हैं = मस्लिहत के कद्मो मे खम होना और काँधों पर बोझ !!! अडिशनल इल्स्ट्रेशंस है इस शेर मे !! जिससे शेर का सौन्दर्य बढा है और अर्थ विशाल हुआ है !!
    अभय साहब ग़ज़ल के लिये बधाई !!! मयंक

  3. बेशक ख़ता हुई कि तुम्हें अपना कह दिया
    जुर्मे-वफ़ा क़ुबूल मगर जान कर न था
    वाह! मगर अब क्या? सु दर प्रस्तुति

  4. Behad khubsurat ghazal kya bat hai, zindawaad zindawaad

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