10 टिप्पणियाँ

T-17/30 लुटने का ख़ौफ़ जान से जाने का डर न था-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

लुटने का ख़ौफ़ जान से जाने का डर न था
बस बात इतनी साथ मिरे रहबर न था

माहौल पुरसुकूं था कहीं शोरो-शर न था
बच्चे न थे तो घर सा मिरा अपना घर न था

आहों में जितना चाहिये उतना असर न था
इस वास्ते तो राहते-जां मेरे घर न था

ईसार, प्यार, मेहर, मुहब्बत, वफ़ा, ख़ुलूस
सब कुछ हमारे पास इधर था उधर न था

वो भी तो दौर था यहीं हम भी थे आप भी
यूँ बेहिसी की क़ैद में कोई बशर न था

ग़म का पहाड़ टूटा था उस शख्स पर मगर
रत्ती भर उसके चेह्रे पे ग़म का असर न था

फिर कैसे कट गया मिरा मुश्किल भरा सफ़र
वो कौन था जो साथ मिरे तू अगर न था

तुम साथ-साथ थे तो पता ही नहीं चला
वरना सफ़र हयात का यूँ मुख़्तसर न था

लेकर निकल पड़ा मैं हथेली पे अपनी, जान
हक़ मेरे साथ था मुझे बातिल का डर न था

ठोकर लगी तो होश ठिकाने पे आ गये
वरना उसे यक़ीन मिरी बात पर न था

बज़मे-सुख़न में रखता भी मैं किसके सर पे ताज
शायाने-शान ऐसा वहाँ कोई सर न था

मेरे हुनर पे ऐब निकला किये वही
झोली में जिनकी ऐब था कोई हुनर न था

मुजरिम मुआफ करना मिरे खूं में हैं ‘शफ़ीक़’
ऐसा नहीं है शाना-ए-दुश्मन पे सर न था

‘शफ़ीक़’ रायपुरी 09406078694

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10 comments on “T-17/30 लुटने का ख़ौफ़ जान से जाने का डर न था-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

  1. भैई ,ये तो पिछले वाली से भी ग़ज़ब है !
    ” वो कौन था जो साथ मेरे तू अगर न था”
    यहाँ तो पढनें और सीखने के लिए इतना कुछ है, अफसोस, इतने दिन मैं कहाँ रहा !
    लिखने वाले को तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि Original काम कर रहे हो साहब और ग़ज़ब तरीके से कर रहे हो।
    दाद क़बूल करें !

  2. बहुत खूब शफ़ीक़ साहब, दाद कुबूलें

  3. माहौल पुरसुकूं था कहीं शोरो-शर न था
    बच्चे न थे तो घर सा मिरा अपना घर न था
    तुम साथ-साथ थे तो पता ही नहीं चला
    वरना सफ़र हयात का यूँ मुख़्तसर न था
    आ. शफ़ीक़ सा. बहुत खुबसूरत अशहार हुए हैं ,तहेदिल से दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  4. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है शफीक़ साहब! दिली दाद क़ुबूल हो!

  5. poori ki poori ghazal bahut umda hui hai shafeeq sahab… pahla matla hi itna khuubsurat hai ki kya kahen… deegar ash’aar bhi bahut psand aaye.. daad qubulen

  6. ”PHIR EK BAAR GHAZAL PAR BEHTAREEN TABSIRA” AUR ”ASH’AAR KI UMDA WAZAAHAT” BHAI YE AAP HI KA HAQUE HAI, HAUSLA AFZAAYI KE LIYE MAMNOON HOO’N. BAHUT BAHUT SHUKRIYA.

  7. लुटने का ख़ौफ़ जान से जाने का डर न था
    बस बात इतनी साथ मिरे रहबर न था
    आपके साथ कोई चारगर या राहबर नही था ,, किस्मत के धनी हैं आप !! इसीलिये ज़िन्दगी किसी मोतबर मुकाम पर पहुँच गई .. खूब तंज़ है मतले मे श्फीक़ साहब !!
    माहौल पुरसुकूं था कहीं शोरो-शर न था
    बच्चे न थे तो घर सा मिरा अपना घर न था
    एक शेर पवन कुमार जी का .. बेतर्तीब सा घर ही अच्छा लगता है
    बच्चो को चुपचाप बिठा कर देख लिया –पवन कुमार
    आहों में जितना चाहिये उतना असर न था
    इस वास्ते तो राहते-जां मेरे घर न था
    सच है !!! दर्द हद से गुज़रता तो राहते जाँ का दर खुलता !!
    ईसार, प्यार, मेहर, मुहब्बत, वफ़ा, ख़ुलूस
    सब कुछ हमारे पास इधर था उधर न था
    इधर तो आँख बरसती है दिल धड़कता है
    ये सानिहत तुम्हारे यहाँ नही होते
    वफा का ज़िक्र चलाया तो हमसे के बोले वो
    “फ़ुज़ूल काम हमारे यहाँ नहीं होते ”

    ईसार, प्यार, मेहर, मुहब्बत, वफ़ा, ख़ुलूस.. किसी के लिये ये गुहर हैं किसी के लिये कंकर पत्थर !!
    वो भी तो दौर था यहीं हम भी थे आप भी
    यूँ बेहिसी की क़ैद में कोई बशर न था
    अब इत्र भी मलो तो मुहब्बत की बू नहीं ….
    ग़म का पहाड़ टूटा था उस शख्स पर मगर
    रत्ती भर उसके चेह्रे पे ग़म का असर न था
    इस शख़्स को आप क्या कहेंगे !1 पत्थर !! कि चट्टान !!हम तो उसे मयंक अवस्थी कहते हैं ):
    गम आयें तो बाँहे फैला कर मिलिये
    सिर ऊँचा सीना चौड़ा हो जाता है
    फिर कैसे कट गया मिरा मुश्किल भरा सफ़र
    वो कौन था जो साथ मिरे तू अगर न था
    ये ज़मीन ये आसमान जिसके हैं जिसकी संसार मे सारी प्रजा है वो ही साथ था उस वक़्त !!!
    तुम साथ-साथ थे तो पता ही नहीं चला
    वरना सफ़र हयात का यूँ मुख़्तसर न था
    मैं मैकदे की राह से हो कर गुज़र गया
    वर्ना सफर हयात का काफी तवील था
    लेकर निकल पड़ा मैं हथेली पे अपनी, जान
    हक़ मेरे साथ था मुझे बातिल का डर न था
    क्या जज़्बा है !! क्या यकीन है !! वाह !!
    ठोकर लगी तो होश ठिकाने पे आ गये
    वरना उसे यक़ीन मिरी बात पर न था
    इस अँधेरे मे तो ठोकर ही उजाला देगी
    रात जंगल मे कोई शम्म: जलाने से रही –निदा
    बज़मे-सुख़न में रखता भी मैं किसके सर पे ताज
    शायाने-शान ऐसा वहाँ कोई सर न था
    यही माहौल है आजकल !! तिरी दस्तार तुझको ढो रही है
    तेरे काँधों पे तेरा सर नहीं है –मनमोहन शेर है !!
    मेरे हुनर पे ऐब निकला किये वही
    झोली में जिनकी ऐब था कोई हुनर न था
    उन्हीं को फुर्सत है और उन्ही के लिये निन्दा खाद पानी है जिनमे एब निकालने का ऐब है !!
    मुजरिम मुआफ करना मिरे खूं में हैं ‘शफ़ीक़’
    ऐसा नहीं है शाना-ए-दुश्मन पे सर न था
    खूब मक़्ता कहा है ‘शफ़ीक़’ रायपुरी साहब !!! ग़ज़ल पर दाद !! दूसरी पेशकश बेहतरीन रही –मयंक

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