7 टिप्पणियाँ

T-17/28 मुफ़लिस न था अमीर न था ताजवर न था-मुनव्वर अली ‘ताज’

मुफ़लिस न था अमीर न था ताजवर न था
उल्फ़त की बारगाह में ज़ेरो-ज़बर न था

रिश्ता किया हवस ने वो जिसमें ये डर न था.
फेरे न थे निकाह न था कुछ महर न था

कारण पता लगा ये मुहब्बत की मौत का
दिल का सुलूक़ उस के लिये मोतबर न था

अपनी गज़ल की चाह में जब जा रहा था मैं
तब इस सफ़र में कोई मिरा हमसफ़र न था

झरने न थे पहाड़ न थे वादियां न थीं
इतना नज़रनवाज़ हमारा सफ़र न था

फिर भी चमक रही थी तबस्सुम की कहकशां
सूरज न था नुजूम न थे और क़मर न था

ऐ ख़ुशख़याल आप यूं कैसे ग़ुज़र गये
क्या रहग़ुज़र में आपकी ख़ादिम का घर न था.

मुनव्वर अली ‘ताज’ 09893498854

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7 comments on “T-17/28 मुफ़लिस न था अमीर न था ताजवर न था-मुनव्वर अली ‘ताज’

  1. “कैसे गुजर गए •••• ग़ज़ब है !
    वाह वाह छोटी पड गई है।
    ग़ज़ब

  2. बहुत खूब मुनव्वर साहब, दाद कुबूलें

  3. फिर भी चमक रही थी तबस्सुम की कहकशां
    सूरज न था नुजूम न थे और क़मर न था
    आ. ताज सा. बहुत खुबसूरत ख्याल है ,ग़ज़ल पर तहेदिल से दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  4. badhiya ghazal taaz sahab.. matle par bataure khaas daad qubul karen

  5. मुफ़लिस न था अमीर न था ताजवर न था
    उल्फ़त की बारगाह में ज़ेरो-ज़बर न था
    मुहब्बत सच्ची इबादत्गाह है !!! यहाँ दुई का भेद गिर जाता है !!! – मतले पर वह !!!
    रिश्ता किया हवस ने वो जिसमें ये डर न था.
    फेरे न थे निकाह न था कुछ महर न था
    हवस, जोश, ज़िद, और जुनून –इनमे बारीक सा फर्क है –लेकिन एक बात तय है कि ये सब अतार्किकता की ज़मीन पर खड़े मूल्य हैं – इनके इख़्तियार में जब कोई काम किया जाता है तो उसे दीवानगी कहते हैं और दीवानगी सामाजिकता से भिन्न आचरण है– फेरे न थे निकाह न था कुछ मेहर न था….. !!!
    अपनी गज़ल की चाह में जब जा रहा था मैं
    तब इस सफ़र में कोई मिरा हमसफ़र न था
    अपनी गज़ल की चाह में जब जा रहा था मैं……. तब अपने अश्क दामन पाक कर रहे थे , तब अपने आबले मीलों के सफर की थकन को भुला रहे थे –तब अपने दिल के जख्म फूलो मे तब्दील हो रहे थे फिर आहिस्ता आहिस्ता अपनी ही कराह संगीत बन गई और अपने ही नाले अशाअर मे तब्दील हो गये … इसके बाद हम शाइर हो गये …. फिर लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया … बड़ी मुख़्तसर सी (!!!) दास्तान है अपनी गज़ल की चाह की रहगुज़र की … वाह !!!
    झरने न थे पहाड़ न थे वादियां न थीं
    इतना नज़रनवाज़ हमारा सफ़र न था
    हम सहरानवर्द थे !! ये सब दूसरीकिसी दुनिया के मनाज़िर है!!!!
    फिर भी चमक रही थी तबस्सुम की कहकशां
    सूरज न था नुजूम न थे और क़मर न था
    तब्स्सुम की कहकशाँ !! ने रोशनी के कहत को खारिज कर दिया .. बहुत खूब ताज साहब !! बहुत खूब !!
    ऐ ख़ुशख़याल आप यूं कैसे ग़ुज़र गये
    क्या रहग़ुज़र में आपकी ख़ादिम का घर न था.
    क्या लहजा है शेर का !!! क्या लहजा है !!! रिवायत नाज़ कतई है ऐसी कहन पर –वाह !!!
    मुनव्वर अली ‘ताज’ साहब !! ये ग़ज़ल भी बहुत उम्दा कही है आपने !!दाद दाद दाद !!! –मयंक

    • मोहतरम मयंक साहिब
      आप गज़ल के हुस्न को जिस पारखी नज़र से देखते हैं वो नज़रिया अहले सुख़न को कलाम की फसाहतो बलागत से रूशनास करवाता है और ख़ूब से ख़ूब तर कहने की तरगीब देता है ! आपकी इस पुरख़ुलूस ख़िदमते सुख़न के लिये हम आपके मशकूरो ममनून हैं और बतौर शुकरिया T – 17 – 3 आपकी सुख़न नवाज़ी के लिये पेश करते हैं

      – *-*- ग़ज़ल -*-*-

      वो था सदाबहार ख़िज़ाओं का डर न था
      बेशक शजर सुख़न का कहीं बेसमर न था

      बीवी भी थी ज़मीन भी थी मालो ज़र भी था
      फिर भी मिरे नसीब में नूरे नज़र न था

      माना लहू से शेर मिरा तरबतर न था
      फिर भी सहर सुख़न का कहीं बेअसर न था

      नारा लगा रहे थे सभी वंदे मातरम
      भारत का इंक़िलाब था गोरों ग़दर न था

      हम चल दिये तो रंजो अलम साथ हो लिये
      फरहत न थी सुकून न था राहबर न था

      भूचाल बाढ़ और उबलना ज़मीन का
      आमाल की सज़ाएँ थीं उसका क़हर न था

      रिशतों के ख़ार ज़ार से ऐसे ग़ुज़र गया
      शिकवे का दाग़ ‘ताज’ के किरदार पर न था

      मुनव्वर अली ताज
      09893498854

      • ताज साहब !! इस ख़ुलूस और मुहब्बत के लिये अल्फाज़ नहीं है मेरे पास !! किसी भी ज़मीन पर शेर कहने की अपकी क्षमता चमत्कृत कर देने वाली है !! ये शेर भी बहुत खूब्सूरत कहे हैं आपने !!
        वो था सदाबहार ख़िज़ाओं का डर न था
        बेशक शजर सुख़न का कहीं बेसमर न था
        600 बरस से ये शजर सदाबहार है !! ख़िज़ायें इसे और ज़ियादा बासमर करती हैं !1
        बीवी भी थी ज़मीन भी थी मालो ज़र भी था
        फिर भी मिरे नसीब में नूरे नज़र न था
        यहाँ मालिक के मर्ज़ी चलती है !!! जिसकी दुनिया है वही औलाद का सुख दे सकता है !!!
        माना लहू से शेर मिरा तरबतर न था
        फिर भी सहर सुख़न का कहीं बेअसर न था
        ज़रूर !! कुछ लोग मंज़र को बाज़ारू बनाने के लिये –ज़ुबान को तल्ख़ और लहजे को करख़्त बना लेते हैं लेकिन ज़हानत और शाइस्तगी के पैरहन शाइरी के लिये बेहतर हैं और एक शेर स्वर्गीय कृष्ण बिहारी नूर साहब का –
        तमाम जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था
        कोई न जान सका रख -रखाव ऐसा था –नूर साब !!

        नारा लगा रहे थे सभी वंदे मातरम
        भारत का इंक़िलाब था गोरों ग़दर न था
        तस्लीम !!
        हम चल दिये तो रंजो अलम साथ हो लिये
        फरहत न थी सुकून न था राहबर न था
        कौन मेरे हमराह था?!! रंजो अलम !!! और जिनकी सफर मे दरकार थी- वो नहीं थे –सुकून नही राहबर नही !! शिद्द्द्ते अहसास से उपजा शेर शिद्दते अहसास तक पहुँचा है !!
        भूचाल बाढ़ और उबलना ज़मीन का
        आमाल की सज़ाएँ थीं उसका क़हर न था
        अपने ही कर्मो की सजा है !! उसका कहर नहीं है !! पारसा का बयान है ये जिसे असीम आस्था है काइनात को बनाने वाले पर !! वाह !!
        रिशतों के ख़ार ज़ार से ऐसे ग़ुज़र गया
        शिकवे का दाग़ ‘ताज’ के किरदार पर न था
        ये भी बड़ी बात है !! उम्रे दराज़ चार दिनो की और सब कुछ यहीं छोड़ कर जाना है !! अपने दायरे रिश्तो के ही होते हैं –और ये राहे पुरख़ार होती है ऐसे मे जैसी दुनिया मालिक ने हमारे नाम से मंसूब की उसे जस का तस स्वीकार कर लेना !! किसी से कोई शिकवा शिकायत न होना !! एक सदाकत की राह पर चलने वाले और अपने अम्ल को कभी न भूलने वाले नेकनीयत इंसान के ही बूते की बात है!! फिराक़ साहब का कहना था कि जिस वयक्ति के अंतस मे गरिमामय मानवीय मूल्य होते हैं वो ही अच्छी शाइरी कर सकता है !! जीवन के मूल्य और सिद्धांत हमारी कहन मे आ ही जाते है! !
        ताज साहब इस बयान पर भी आपको पूरी दाद !! बेहद ममनून हूँ और तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपका –मयंक

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