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T-17/27 या ज़िन्दगी को जीने का मुझमें हुनर न था-अहमद ‘सोज़’

या ज़िन्दगी को जीने का मुझमें हुनर न था
या मेरा ही ख़मीर मुझे मोतबर न था

तर्के-तअल्लुक़ात ने खोला है भेद ये
इक दूजे के बग़ैर हमारा गुज़र न था

अब बैठ कर जो सोचूँ तो लगता है यूँ मुझे
जिसको सकून कहते है वो उम्र-भर न था

कुछ अजनबी तो साथ खड़े हो गए मिरे
लेकिन मिरे लिए मिरा लख्ते-जिगर न था

मैं जानता हूँ जितने ख़ुदाओं को उनमें से
दंगा हुआ था कल जहाँ कोई उधर न था

जब दोस्ती की बात आयी आँख मूँद ली
ऐसा नहीं कि दोस्तों में बाख़बर न था

राहत, सकून, चैन, ख़ुशी कुछ न था वहाँ
भेजा गया था मैं जहाँ कुछ भी जिधर न था

काजल कहीं है ज़ुल्फ़ कहीं ग़ाज़ा है कहीं
लगता है आज आईना पेशे-नज़र न था

हमने उधर न जाने की खायी न थी क़सम
“उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था”

साये में पल के जसके जवां “सोज़” मैं हुआ
अब लौट कर गया तो वहां वो शजर न था

अहमद ‘सोज़’ 09768556225

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5 comments on “T-17/27 या ज़िन्दगी को जीने का मुझमें हुनर न था-अहमद ‘सोज़’

  1. बहुत खूब अहमद साहब, दाद कुबूल कीजिए

  2. तर्के-तअल्लुक़ात ने खोला है भेद ये
    इक दूजे के बग़ैर हमारा गुज़र न था वाह ….क्या बात है

    अब बैठ कर जो सोचूँ तो लगता है यूँ मुझे
    जिसको सकून कहते है वो उम्र-भर न था
    आ सोज़ सा. लाज़वाब अशहार हुए हैं ,ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  3. अब बैठ कर जो सोचूँ तो लगता है यूँ मुझे
    जिसको सकून कहते है वो उम्र-भर न था
    मेरे लिए ये हासिले ग़ज़ल है।

    वाह क्या खूब मतला हुआ है। टूटे दिल वालों के लिए pain killer का काम करता रहेगा या बढ़ाएगा मालूम नही। एक उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई।

  4. doosri ghazal bhi bharpoor hui hai soz sahab… bharpoor daad…

  5. तर्के-तअल्लुक़ात ने खोला है भेद ये
    इक दूजे के बग़ैर हमारा गुज़र न था

    Kya bat hai ki tarq e t alluq ke baad bhi
    mud mud ke dekhate hain tiri rahaguzar ko hum
    Ujalat -zid junoon me rishte khona theek nahin –Umda sher kaha hai !!!

    अब बैठ कर जो सोचूँ तो लगता है यूँ मुझे
    जिसको सकून कहते है वो उम्र-भर न था

    sahara ka safar aur sarabon ke faasle !! zindagi isi shai ka naam hai !!! sukun kahan hai isame !!!

    कुछ अजनबी तो साथ खड़े हो गए मिरे
    लेकिन मिरे लिए मिरा लख्ते-जिगर न था
    Almeeya hai hamare daur ka !!! Apana khoon apana nahin aaj !!!

    मैं जानता हूँ जितने ख़ुदाओं को उनमें से
    दंगा हुआ था कल जहाँ कोई उधर न था
    muhattaram !! dange ke manzar ke peechhe pasamanzar me –wahi mileinge –Ye wahi khuda ki zameen hai ye wahi buton ka nizaam hai !!!

    जब दोस्ती की बात आयी आँख मूँद ली
    ऐसा नहीं कि दोस्तों में बाख़बर न था
    mutthiyon me khaaq le kar dost aaye waqte dafn
    zindagi bhar ki muhabbat ka sila dene lage !!

    हमने उधर न जाने की खायी न थी क़सम
    “उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था”
    lahaja bhaa raha hai girah ka !! andaaz juda hai kahan ka !!

    साये में पल के जसके जवां “सोज़” मैं हुआ
    अब लौट कर गया तो वहां वो शजर न था

    wahan koi faseel khadi hogi –tarakki ka daur hai aur tarakki ki daud hai !!
    soz sahab !! khoob sher kahe hai !! ___badhai –Mayank

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