8 टिप्पणियाँ

T-17/26 क्यूँ अपना लग रहा था वो अपना अगर न था-प्रेम ‘पहाड़पुरी’

क्यूँ अपना लग रहा था वो अपना अगर न था
था मुख़्तसर सवाल मगर मुख़्तसर न था

दुनिया की रस्मो-राह से मैं बाख़बर न था
इस वास्ते यहाँ के ग़मों से मफ़र न था

अहबाब मेरे लाये हैं मेरे रक़ीब को
क्या शहर भर में और कोई चारागर न था

हर चंद ख़ामियों पे मिरी तानाज़न रहा
यानी कि मेरी सिम्त से वो बेख़बर न था

दुनिया-ए-रेगज़ार का मैं ऐसा था परिन्द
जिसकी नज़र में दूर तलक इक शजर न था

उसकी गली के वास्ते भेजे गये थे हम
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

अज़मे-सफ़र हुआ तो वो क़ुव्वत नहीं रही
जब क़ुव्वते-सफर थी तो अज़मे-सफर न था

प्रेम ‘पहाड़पुरी’ 09352589810

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8 comments on “T-17/26 क्यूँ अपना लग रहा था वो अपना अगर न था-प्रेम ‘पहाड़पुरी’

  1. बहुत खूब प्रेम साहब, दाद कुबूलें

  2. अहबाब मेरे लाये हैं मेरे रक़ीब को
    क्या शहर भर में और कोई चारागर न था

    हर चंद ख़ामियों पे मिरी तानाज़न रहा
    यानी कि मेरी सिम्त से वो बेख़बर न था
    आ. प्रेम सा. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल और लाज़वाब अशहार हैं ,ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  3. बहुत उम्दा ग़ज़ल प्रेम साहब! दिली दाद!

  4. क्यूँ अपना लग रहा था वो अपना अगर न था
    था मुख़्तसर सवाल मगर मुख़्तसर न था
    सवाल मुख़्तसर नहीं है – ज़िन्दगी के कई रंग तर्क की हदों मे नहीं समाते !! कोई बेसबब दिल को भाये तो इसे मुहब्बत ही कहेंगे –लेकिन मुहब्बत तो वो शै है जो काइनात मे नहीं समा सकती !!! मतले पर दाद !!
    दुनिया की रस्मो-राह से मैं बाख़बर न था
    इस वास्ते यहाँ के ग़मों से मफ़र न था
    दाम हर मौज मे है हल्काए सदकामे नहंग
    देखे क्या गुज़रे है कतरे पे गुहर होने तक –
    गेम हस्ती का असद किससे है ……,ग़ालिब
    हर चंद ख़ामियों पे मिरी तानाज़न रहा
    यानी कि मेरी सिम्त से वो बेख़बर न था
    वो औरो से ज़ियादा बाख़बर रह होगा !! क्योंकि निन्दा –रसपान का आनन्द अप्रतिम और विलक्षण होता है !!!
    दुनिया-ए-रेगज़ार का मैं ऐसा था परिन्द
    जिसकी नज़र में दूर तलक इक शजर न था
    मंज़र काफी अच्छा है –बेसम्त तनहा सफर !! और कड़े कोस !! शेर अकेलेपन और निराश्रयता कौकेरने मे सफल है !!
    उसकी गली के वास्ते भेजे गये थे हम
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    वाह !!!
    अज़मे-सफ़र हुआ तो वो क़ुव्वत नहीं रही
    जब क़ुव्वते-सफर थी तो अज़मे-सफर न था
    शेर का शिल्प खूब है !!!
    अपने ही पोदीने मिर्चे सूख गये
    वर्ना दुनिया माश की दाल तो अब भी है –बशीर
    अज़मे-सफ़र हुआ तो वो क़ुव्वत नहीं रही…. वाह !!!

    प्रेम साहब गज़ल पर बधाई!!! –मयंक

  5. PREM SAHAB PAHAADPURI, JANAAB KAMAAL KIYA HAI AAP NE, SABHI ASH’AAR UMDA NIKAALE HAI’N. GIRAH BHI KHOOB LAGAAYI HAI AISA LAG RAHA HAI K ASL SHER YAHI HAI उसकी गली के वास्ते भेजे गये थे हम KHOOB BARJASTAGI HAI BHAI,

    उसकी गली के वास्ते भेजे गये थे हम
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    LAFZO’N K ULAT PHER NE IS SHER KO ZABAAN KA SHER BANA DIYA HAI.
    अज़मे-सफ़र हुआ तो वो क़ुव्वत नहीं रही
    जब क़ुव्वते-सफर थी तो अज़मे-सफर न था
    KYA KAHNE WAAH MAZA AA GAYA ”MUBAARAKBAAD”

  6. खूबसूरत ग़ज़ल हुई है भाई प्रेम जी !
    मतला खासा पसंद आया | दाद क़ुबूल कीजिये !!

  7. दुनिया-ए-रेगज़ार का मैं ऐसा था परिन्द
    जिसकी नज़र में दूर तलक इक शजर न था

    sari ghazal achhi hai lekin yah she’r bahut zyada pasand aayaa. daad hazir hai.

  8. bahut acchi ghazal hui hai prem ji… daad qubulen

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