21 टिप्पणियाँ

T-17/25 दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था-सौरभ शेखर

दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था
इतना यक़ीन मुझको मिरी आँखों पर न था

हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
इंसान था मियां वो कोई जानवर न था

बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था

था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था

उसका ख़याल, उसकी तलब, उसकी जुस्तजू
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

ताज़ा है दिल का ज़ख्म मगर हँस रहा हूँ मैं
ग़मगीन रहना था अभी अफ़सोस करना था

रह-रह के कसमसाता था क्या जिस्म में मिरे
‘सौरभ’ बदन में क़ैद मिरे कुछ अगर न था.

सौरभ शेखर 09873866653

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21 comments on “T-17/25 दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था-सौरभ शेखर

  1. बहुत खूब सौरभ साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
    दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था
    बहुत खूब शेर है भाई सौरभ जी! इस दौर की हकीकत बयान करता हुआ. अच्छी ग़ज़ल हुई है.

  3. हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
    इंसान था मियां वो कोई जानवर न था

    बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
    दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था

    था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
    परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था

    वाह भैया पूरी की पूरी ग़ज़ल खूबसूरत हुई है। इक मेसेज देती हुई और कहीं चोट करती हुई। साधू।

  4. हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
    इंसान था मियां वो कोई जानवर न था..

    बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
    दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था…

    Kya kehne bhaiya. ..behad umdaa ghazal. …

    उसका ख़याल, उसकी तलब, उसकी जुस्तजू
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’…wahh Kya girah lagai hai ..daad qubule’n
    -Kanha

  5. बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है सौरभ भैया
    हर शेर उम्दा .हट के
    इस ग़ज़ल ने समाज के ढेरों ग़म समेटे हुए हैं
    इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको ढेरों दाद
    With regrds

  6. लक्ष्मी के आगमन की शुभकामनायें सौरभ !!!
    दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था
    इतना यक़ीन मुझको मिरी आँखों पर न था
    मतला अच्छा है !!!
    दुनिया को क्या ख़बर यहाँ क्या हादसा हुआ
    फेंका था उसने संग गुलों में लपेट के –शिकेब
    हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
    इंसान था मियां वो कोई जानवर न था
    पशु यानी जो पाश में बँधा हो –और इच्छा अपेक्षा चिंता कुण्ठा में बँधा हुआ आदमी आज ही नहीं सदियों से सबसे बड़ा हैवान साबित हुआ है !!!
    बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
    दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था
    किसका दावा है पारसाई का ….ज़रा मुख़्तलिफ़ अन्दाज़ मे पूछा है !!
    था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
    परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था
    हर नई कौम को इक ताज़ा मदीने की तलाश
    साथियों अब कोई हिज्रत नहीं होने वाली –इफ़्तिख़ार आरिफ
    उसका ख़याल, उसकी तलब, उसकी जुस्तजू
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    यानी तरही मिसरा अंगार था – जुज़ इसके कोई और ख्याल बँधा नहीं इस मिसरे पर !!!
    ताज़ा है दिल का ज़ख्म मगर हँस रहा हूँ मैं
    ग़मगीन रहना था अभी अफ़सोस करना था
    रिवायत यही है!!! अच्छा तंज़ है!! रोना ज़रूरी है वर्ना कहा जाता है कि न रोने वाला ह्रदयहीन है जब्कि कहने वाले कह गये हैं — शक न कर मेरी खुश्क आँखो पर
    यूँ भी आँसू बहाये जाते हैं
    रह-रह के कसमसाता था क्या जिस्म में मिरे
    ‘सौरभ’ बदन में क़ैद मिरे कुछ अगर न था.
    बारहा हमने ये पाया कि लहू में था शरर
    अपनी दुखती हुई रग जब भी निचोड़ी हमने –मयंक
    सौरभ !! ग़ज़ल के लिये बहुत बहुत बधाई!!

  7. दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था
    इतना यक़ीन मुझको मिरी आँखों पर न था
    आ. सौरभ सा.
    शानदार मतला हुआ है ,सभी अशहार नायाब है|बधाई कबूल फरमाएं |

  8. SAURABH SAHAB UMDA GHAZAL HUI HAI, SABHI SHER PASAND AAYE, MUBAARAKBAAD PESH KARTA HU’N.

  9. हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
    इंसान था मियां वो कोई जानवर न था

    रह-रह के कसमसाता था क्या जिस्म में मिरे
    ‘सौरभ’ बदन में क़ैद मिरे कुछ अगर न था.

    वाह, खूबसूरत अशआर हुए हैं भाई सौरभ जी !
    दाद क़ुबूल कीजिये !!

  10. Saurabh Shekhar sahab,

    दावा करूँ कि संग था इक, वो गुहर न था
    इतना यक़ीन मुझको मिरी आँखों पर न था

    हैवानियत से जिसकी यूँ हैरतज़दा थे लोग
    इंसान था मियां वो कोई जानवर न था

    बू ख़ून की न आती थी किस हाथ से कहो
    दामन लहू से बोलो ज़रा किसका तर न था

    था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
    परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था

    रह-रह के कसमसाता था क्या जिस्म में मिरे
    ‘सौरभ’ बदन में क़ैद मिरे कुछ अगर न था.

    …….wow !
    behad khoobsoorat Ghazal ke behatareen ash’aar ke liye haardik badhai

  11. saurabh bhai.. matla ta maqta umda hui hai ghazal…
    था हमक़दों का ख़ाक उड़ाता हुज़ूम इक
    परचम कहीं नहीं था, कोई राहबर न था
    is she’r ka to jawaab nahi… waah

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