9 टिप्पणियाँ

T-17/24 अपनी पहुँच से उसका बहुत दूर घर न था-गोविन्द गुलशन

अपनी पहुँच से उसका बहुत दूर घर न था
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

कल मौत मुझको बाल बिखेरे हुए मिली
जीने का ज़ोम था मुझे मरने का डर न था

ये ताल-मेल है मिरा इक माहताब से
कल वो उधर नहीं था तो मैं भी उधर न था

ठहरा हुआ था मैं तो मुहब्बत की छाँव में
वो घर था छप्परों का वहाँ कोई दर न था

ऐसा नहीं कि बुज़दिली ओढ़े हुए थे हम
बस यूँ समझिये हाथ ही तलवार पर न था

दीवाना कह रहे थे सभी मुझको देख कर
बस ख़ैर ये हुई कोई पत्थर उधर न था

हमको ही याद कर लिया होता फिर एक बार
ख़ुद ही ख़याल आपको अपना अगर न था

गोविन्द गुलशन 09810261241

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9 comments on “T-17/24 अपनी पहुँच से उसका बहुत दूर घर न था-गोविन्द गुलशन

  1. बहुत खूब गोविन्द साहब। दाद कुबूल कीजिए

  2. अपनी पहुँच से उसका बहुत दूर घर न था
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    वो शै अलभ्य नहीं थी !! बस रिश्तों का रंग ऐसा था कि उधर से रब्त ठहर गया था !!! मतले में गिरह बाँधी है !! सुन्दर गुलशन साहब !!
    कल मौत मुझको बाल बिखेरे हुए मिली
    जीने का ज़ोम था मुझे मरने का डर न था
    ज़िन्दगी और मौत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं – ज़िन्दगी मे हर लम्हा चार सू मौत की अनन्त सम्भावनाये है !!फिर भी शाइर का मर्कज़े ख्याल “ज़िन्दगी” है !! यही सकारतमक सोच है!
    ये ताल-मेल है मिरा इक माहताब से
    कल वो उधर नहीं था तो मैं भी उधर न था
    ठहरा हुआ था मैं तो मुहब्बत की छाँव में
    वो घर था छप्परों का वहाँ कोई दर न था
    ऊपर के दोनो शेर मुहब्बत के दो रंग है !!
    ऐसा नहीं कि बुज़दिली ओढ़े हुए थे हम
    बस यूँ समझिये हाथ ही तलवार पर न था
    मैं वो मक्तूल जो कातिल न बना
    हाथ मेरा भी उठा था पहले –क़तील शिफाई
    दीवाना कह रहे थे सभी मुझको देख कर
    बस ख़ैर ये हुई कोई पत्थर उधर न था
    दीवाने का पत्थरों से अविभाज्य रिश्ता होता है !!! हर समय हर घड़ी हर मोड़ हर गली मे !!
    हमको ही याद कर लिया होता फिर एक बार
    ख़ुद ही ख़याल आपको अपना अगर न था
    हम और आप जुदा शै नहीं –आप अगर अपना ख्याल नहीं कर सकते तो हमें याद करते क्योंकि हम तो हमेशा आपके खयालों मे डूबे रहतेहैं –हमारे हवाले से आप खुद तक पहुँच जाते ॥गोविन्द गुलशन साहब !! ग़ज़ल के लिये बधाई !!!

  3. ऐसा नहीं कि बुज़दिली ओढ़े हुए थे हम
    बस यूँ समझिये हाथ ही तलवार पर न था

    दीवाना कह रहे थे सभी मुझको देख कर
    बस ख़ैर ये हुई कोई पत्थर उधर न था
    आ. गुलशन सा. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हुई है ,बधाई स्वीकार करें
    सादर

  4. बेहद ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है गुलशन साहब
    सभी अश -आर बेहद अछे लगे
    दिली दाद कुबूल कीजिये
    सादर

  5. Puri Ki Puri ghazal behad umdaa hai dada. ..Ye She’r behad pasand aaya
    ..
    ऐसा नहीं कि बुज़दिली ओढ़े हुए थे हम
    बस यूँ समझिये हाथ ही तलवार पर न था…
    waahh. ..daad qubule’n

    -Kanha

  6. दीवाना कह रहे थे सभी मुझको देख कर
    बस ख़ैर ये हुई कोई पत्थर उधर न था
    सुंदर कृति पर पत्थर होता तो न जाने क्या हो जाता ?

  7. वाह वाह, हर शेर उम्दा हुआ है गुलशन जी !
    दाद क़ुबूल कीजिये !!

  8. bahut umda ghazal hui hai gulshan sahab.. waah

  9. मतले में उम्दा गिरह बाँधी है आपने गुलशन साहब! बाक़ी अश’आर में भी ख़ूब रवानी है! ढेरों दाद!

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