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T-17/23 दिल पर किसी की बात का ऐसा असर न था-आलोक मिश्रा

दिल पर किसी की बात का ऐसा असर न था
पहले मैं इस तरह से कभी दरबदर न था

चारों तरफ़ थे धूप के जंगल हरे –भरे
सहरा में कोई मेरे अलावा शजर न था

तारे भी शब की झील में ग़रकाब हो गये
मेरी उदासियों का कोई हमसफ़र न था

कितने हसीन ख़ाब थे …लम्हे थे फूल से
“उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था”

फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था

कल शब न जाने कौन से ग़म थे उफान पर
अश्कों से इस कदर मैं कभी तर-ब-तर न था

आलोक मिश्रा 09876789610/09711744221

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18 comments on “T-17/23 दिल पर किसी की बात का ऐसा असर न था-आलोक मिश्रा

  1. बहुत खूब आलोक साहब, दाद कुबूल कीजिए

  2. alok baqaul dada achchhi shayri hum sab par farz hai aur ye dekhkar khushi mahsoos ho rahi hai aap aur apke aur bhai ye farz badi tatparta se nibha rahe hain yun hi achchha kahte rahiye badhte rahiye ..

  3. फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
    दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था

    कल शब न जाने कौन से ग़म थे उफान पर
    अश्कों से इस कदर मैं कभी तर-ब-तर न था
    आ. आलोक भाई सा. खूबसूरत अशहार के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें

  4. तारे भी शब की झील में ग़रकाब हो गये
    मेरी उदासियों का कोई हमसफ़र न था…

    कितने हसीन ख़ाब थे …लम्हे थे फूल से
    “उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था”..

    फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
    दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था..

    Waahh Kya umdaa ghazal hui hai Alok bhai. ..Dhero’n daad

    -Kanha

  5. फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
    दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था

    वाह क्या बात है। मज़ा आ गया। बहुत बहुत बधाई।

  6. फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
    दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था |

    वाह, बहुत खूब भाई !
    सुन्दर ग़ज़ल, दाद क़ुबूल फरमाएं !!

  7. फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
    दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था..वाह आलोक भाई! ख़ूब ग़ज़ल हुई है! भरपूर दाद!

  8. दिल पर किसी की बात का ऐसा असर न था
    पहले मैं इस तरह से कभी दरबदर न था
    दिल से तिरी निगाह जिगर तक उतर गई !! …. वो जिसकी शक़्ल भी आँखों को नगवार हुई
    उसी के तंज़ को दिल मे बसा लिया मैने …… आलोक भाई !! मतले पर दाद !!!
    चारों तरफ़ थे धूप के जंगल हरे –भरे
    सहरा में कोई मेरे अलावा शजर न था
    सूरज की सल्तनत मे शजर होना बड़ी बात है !!!
    तारे भी शब की झील में ग़रकाब हो गये
    मेरी उदासियों का कोई हमसफ़र न था
    शेर का शिल्प उत्कृष्ट है !!!
    कितने हसीन ख़ाब थे …लम्हे थे फूल से
    “उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था”
    सुन्दर !!
    फ़ुरक़त की आंच थी न तिरी याद की तपिश
    दिल सर्द पड़ रहा था कहीं इक शरर न था
    मंज़र कामयाब है !! माजी मे डूबता हुआ मन अपने वर्तमान से बहुत दूर ले जाता अवसाद !! शेर अपनी बात बख़ूबी कंवे कर रहा है !!
    कल शब न जाने कौन से ग़म थे उफान पर
    अश्कों से इस कदर मैं कभी तर-ब-तर न था
    सोचने के लिये स्पेस दी है शेर ने और मंज़र सोच की दिशा को सहूलियत देने के लिये !! बहुत खूब आलोक !! देर से आई अपकी गज़ल लेकिन सभी शेर सुन्दर कहे हैं –मयंक

    • मयंक भैया प्रणाम
      बहुत कुछ जानने सीखने को मिलता है आपकी विस्तृत टिप्पड़ियों से ….
      हौसलाफजाई के लिए दिल से शुक्रिया

  9. चारों तरफ़ थे धूप के जंगल हरे –भरे
    सहरा में कोई मेरे अलावा शजर न था

    तारे भी शब की झील में ग़रकाब हो गये
    मेरी उदासियों का कोई हमसफ़र न थ

    कल शब न जाने कौन से ग़म थे उफान पर
    अश्कों से इस कदर मैं कभी तर-ब-तर न था

    khoob ash’aar nikaale hai’n AALOK MISHRA sahab aap ne MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  10. आलोक भाई,
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद। वाह..वाह..वाह।
    बुरा न लगे तो यह शे’र मुझे दे दीजिए :
    चारों तरफ़ थे धूप के जंगल हरे –भरे
    सहरा में कोई मेरे अलावा शजर न था
    वाह..वाह।

    • बहुत बहुत शुक्रिया नवनीत साहब
      बेशक ले लीजिये
      हौसलाफजाई के लिए दिल से आभार

  11. bahut umda ghazal hui hai aalok…

    चारों तरफ़ थे धूप के जंगल हरे –भरे
    सहरा में कोई मेरे अलावा शजर न था

    तारे भी शब की झील में ग़रकाब हो गये
    मेरी उदासियों का कोई हमसफ़र न था

    do she’r to behad pasand aaye… bahut khuub mere bhai…

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