10 टिप्पणियाँ

T-17/22 माना बराये-नज्र कोई मालो-ज़र न था-शरीफ़ अंसारी

माना बराये-नज्र कोई मालो-ज़र न था
क्या तेरी चश्मे-तर में भी कोई गुहर न था

तेरा ख़याल तेरा तसव्वुर तिरा करम
तेरे सिवा जहाँ में सभी कुछ तो वरना था

दिल मुब्तिला-ए-ग़म तो रहा हर मक़ाम पर
लेकिन तुम्हारी याद से मैं बेख़बर न था

साथी न कोई साया न हमदम न हमख़याल
राहे-तलब में कोई मिरा हमसफ़र न था

उन के हुज़ूर गुफ्त की ताक़त न थी मगर
क्या इल्तिजाबदोश ये दामाने-तर न था

कुछ ग़म नहीं कि मंज़िले-जानां के आस-पास
सर पर हमारे साया-ए-दीवारो-दर न था

सूखे शजर में शाख़े-तमन्ना हरी रही
ये और बात है कोई बर्गो-समर न था

पत्ते लरज़ रहे थे हवाओं की मार से
लेकिन जबीने-गुल पे हवाओं का डर न था

दिल था कहीं पे फ़िक्र कहीं थी नज़र कहीं
मैंने ये कब कहा तिरा सजदे में सर न था

दरिया, पहाड़, धूप, हवा, फूल, कहकशां
क्या दामने-ग़ज़ल में कहीं इन का घर न था

अब सो रहा हूँ चैन से अपने मकान में
दुनिया में जब रहा तो कोई अपना घर न था

दिल जीत कर जो ले गया अपने कलाम से
लहजे में उसके कोई भी ज़ेरो-ज़बर न था

जिस सम्त चल पड़ा मिरे अश्कों का क़ाफ़िला
मंज़िलबदोश कोई भी रास्ता उधर न था

हर काम मेरा वक़्त पे होता रहा ‘’शरीफ’’
किसने कहा कि मेरी दुआ में असर न था

शरीफ़ अंसारी 09827965460

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10 comments on “T-17/22 माना बराये-नज्र कोई मालो-ज़र न था-शरीफ़ अंसारी

  1. अच्छी ग़ज़ल हुई है शरीफ़ साहब, दाद कुबूल कीजिए।

  2. दिल था कहीं पे फ़िक्र कहीं थी नज़र कहीं
    मैंने ये कब कहा तिरा सजदे में सर न था
    आ. शरीफ़ सा. बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है ,ढेरों दाद कबूल फरमाएं

  3. दिल मुब्तिला-ए-ग़म तो रहा हर मक़ाम पर
    लेकिन तुम्हारी याद से मैं बेख़बर न था

    साथी न कोई साया न हमदम न हमख़याल
    राहे-तलब में कोई मिरा हमसफ़र न था

    जिस सम्त चल पड़ा मिरे अश्कों का क़ाफ़िला
    मंज़िलबदोश कोई भी रास्ता उधर न था

    वाह, वाह ! बेहद खूबसूरत ग़ज़ल जनाब शरीफ़ अंसारी साहब !
    दिली दाद !!

  4. shareef sahab..poori ki poori ghazal ustadana hai… waah waah.. matla behad haseen hai..
    सूखे शजर में शाख़े-तमन्ना हरी रही
    ये और बात है कोई बर्गो-समर न था
    shakhe-tamanna…. kya kahun.. nai nai si hai kuch teri rahguzar phir bhi… behad umdaa she’r… waah waah
    जिस सम्त चल पड़ा मिरे अश्कों का क़ाफ़िला
    मंज़िलबदोश कोई भी रास्ता उधर न था
    ye she’r bhi behad psand aaya.. daad qubulen

  5. शरीफ़ साहब उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई क़ुबूल कीजिये!

  6. माना बराये-नज्र कोई मालो-ज़र न था
    क्या तेरी चश्मे-तर में भी कोई गुहर न था
    मतला – 100 बरस पहले के उस्ताद शाइरों की याद दिलाता है – क्या तेरी चश्मे-तर में भी कोई गुहर न था—इस एक मिसरे ने क्या क्या कह दिया !!! ” काश टू मेरे लिये दो आँसू बहा देता , मुझे दुनिया की सबसे बड़ी निधि मिल जाती !! ” हमें किसी से बस भावना की चाहत थी – ये एक शेर पूरे दीवान का असर रखता है !!
    तेरा ख़याल तेरा तसव्वुर तिरा करम
    तेरे सिवा जहाँ में सभी कुछ तो वरना था
    ज़िन्दगी का पैकर ही तेरे नाम से मंसूब था !! लेकिन बस तू नहीं मयस्सर था !!! क्या खूब क्या खूब !!! महबूब और ईश्वर दोनो के लिये शेर है !!
    दिल मुब्तिला-ए-ग़म तो रहा हर मक़ाम पर
    लेकिन तुम्हारी याद से मैं बेख़बर न था
    वो दिल के दर्द की खुश्बू का आलम है कि मत पूछो
    किसी की याद में ये उम्र जन्नत मे गुज़ारी है –मयंक
    लेकिन तेरे ख्याल से गाफिल नहीं रहा …….जैसी बात है !!
    साथी न कोई साया न हमदम न हमख़याल
    राहे-तलब में कोई मिरा हमसफ़र न था
    राहे- तलब मे सिर्फ एक तवक़्क़ो एक उमीद एक सराब जिसी कोई चेज़ होती है बाकी मंज़र गुम हो जाते हैं –राहे तल्ब के अहसास की शिद्दत को अल्फज़ देता हुआ शेर !!!
    उन के हुज़ूर गुफ्त की ताक़त न थी मगर
    क्या इल्तिजाबदोश ये दामाने-तर न था
    यहाँ दामाने –तर !! उसी ऊँचाई पर है जहाँ दामन निचोड़ दे तो फरिश्ते वज़ू करें –पर दामने तर का मर्तबा था – वाह शरीफ़ साहब वाह !!!
    कुछ ग़म नहीं कि मंज़िले-जानां के आस-पास
    सर पर हमारे साया-ए-दीवारो-दर न था
    मंज़िले-जानां के आस-पास—मुहब्बत के सफर ने अपने हैसियत फक़ीर की बना दी –गम इसलिये नहीं –कि कोई तज़्रुबा कोई फलसफा –हासिल होने से नहीं रहा !!! सफर कामयाब रहा मुहबब्त का !! !!
    सूखे शजर में शाख़े-तमन्ना हरी रही
    ये और बात है कोई बर्गो-समर न था
    सिर्फ एक उमीद के सहारे ज़िन्दगी चलती रही –पुरख़ार और पुरख़तर राहो –कैनवस हरा है इस शेर का और रंग ताज़ा और उजले हैं !!!
    पत्ते लरज़ रहे थे हवाओं की मार से
    लेकिन जबीने-गुल पे हवाओं का डर न था
    गुल पर नज़रे इनायत भी होती है – सभी की !! और गुल का माद्दा भी शाय्द बेश होता है पत्तो से !!!
    दिल था कहीं पे फ़िक्र कहीं थी नज़र कहीं
    मैंने ये कब कहा तिरा सजदे में सर न था
    दौरे हाज़िर के सिजदों की सचाई !! खुदा का डर कम लोगों को है –कई तो रिवायत ढो रहे हैं !! बहुत साहसी शेर है ये !! जिगर वाले का काम है ऐसा शेर कहना !!
    दरिया, पहाड़, धूप, हवा, फूल, कहकशां
    क्या दामने-ग़ज़ल में कहीं इन का घर न था
    अब की शाइरी !! शाम और रात की जकड़ मे है –ये मनाज़िर जो ऊला मिसरे मे हैं साफ देखते नहीं – और कुछ बीनाई भी कम है इस दौर मे !1 अच्चा सवाल उठाया है
    अब सो रहा हूँ चैन से अपने मकान में
    दुनिया में जब रहा तो कोई अपना घर न था
    अब मैं कब्र में दफ़्न हूँ – दुनिया मे घर नहीं मिला !! वाह वाह !! यानी रात बहुत जागे थे सुभ हुई आराम किया !!!
    दिल जीत कर जो ले गया अपने कलाम से
    लहजे में उसके कोई भी ज़ेरो-ज़बर न था
    यही शाइरी –दिल की आवज़ होती है और इसी को कामयाबी मिलती है !!!
    जिस सम्त चल पड़ा मिरे अश्कों का क़ाफ़िला
    मंज़िलबदोश कोई भी रास्ता उधर न था
    जज़्बात गैरबाद हल्कों तक चले गये !!!
    हर काम मेरा वक़्त पे होता रहा ‘’शरीफ’’
    किसने कहा कि मेरी दुआ में असर न था
    ये काइनात के मालिक को धन्यवाद है और ऐसे शेर कम कहे जाते हैं –
    हुबाब हूँ मेरा दरिया मुझे समोये है
    बड़ा यकीन मुझे अपने बादशाह मे है …
    मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह मे है
    कि मैं कही भे रहूँ तू मेरी निगाह मे है
    शरीफ़ अंसारी साहब !! आला बयान !! बहुत खूब !! क्या खूब गज़ल कही है आपने !!1 बधाई बधाई बधाई और शुक्रिया !! –मयंक

  7. wahh wahh….ANSARI SB….kamaal ki ghazal kahi he aapne….lajwaab andaze bayaN….bemisaal fikr
    har sher khud meN ek ghazal he
    sabhi sher bahut hi pasand aaye
    verna…. ka istemaal aapke pukhta ahle-fan
    hone ki gawaahi deta he
    lajwaabbbbbbbb….lajwaabbbbbbbb

  8. Shareef sahab poori ki poori ghazal behtareen hui. Aisi achchi ghazal hum tak pahunchane ke liye apka bahut bahut bahut shukriya….

  9. SHAREEF SAHAB AAP KI GHAZAL KE KIS KIS SHER KI DAAD DI JAAYE, YAHA’N TO ”HAMA KHAANA AAFTAAB AST” WALA MU’AAMLA HAI. MATLE SE MAQTE TAK POORI GHAZAL MURASSA HAI. MUBAARAKBAAD PESH KARTA HU’N.

  10. जनाब शरीफ़ अंसारी साहब,
    अच्‍छी ग़ज़ल हुई।
    बधाई।
    सादर
    नवनीत

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