27 टिप्पणियाँ

T-17/21 पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था-द्विजेन्द्र द्विज

पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था
वक़्ते-सहर था दोस्तो ! नूरे-सहर न था

उन पे कभी कहीं भी मुझे कोई डर न था
जिन रास्तों पे कोई मिरा हमसफ़र न था

ले दे बस हमारा जुनूँ था हमारे साथ
इसके सिवा कुछ और तो रख़्ते-सफ़र न था

हम जुस्तजू में उसकी तमाशा तो बन गये
दीदावरों की भीड़ में वो दीदावर न था

उसकी गली पे हम तो दिलो-जाँ से थे निसार
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

दस्ते-करम पे सदक़े तुम्हारे ऐ चारागर !
गहरा तो इस क़दर मिरा ज़ख़्मे-जिगर न था

बस रहनुमा पे उँगली उठाने की देर थी
पहले हमारा रास्ता यूँ पुरख़तर न था

बाहर से हमने ख़ुद को पुकारा जो बार-बार
अन्दर हमारे नाम का कोई बशर न था

देखा जो अपनी आँखों में आँखों को डाल कर
अक्सर हमारे काँधों पे अपना ही सर न था

क्यों फिर वहीं उम्मीद की कोंपल दिखायी दी
सहरा की रेत में जहाँ कोई शजर न था

लाये थे हम जो सात समन्दर खँगाल कर
उस दिल-गुहर का कोई यहाँ दीदावर न था

द्विजेन्द्र द्विज 09418465008

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27 comments on “T-17/21 पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था-द्विजेन्द्र द्विज

  1. बहुत सुन्दर…उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई…
    नयी पोस्ट@आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

  2. खूबसूरत ग़ज़ल हुई है द्विज साहब। दिली दाद कुबूल करें

  3. Reblogged this on My Blog and commented:
    दोस्तो!
    वेब पत्रिका लफ़्ज़ के तरही मुशायरे में मेरी कोशिश:

  4. ज़बरदस्त ग़ज़ल हुई है द्विजेन्द्र द्विज साहब
    दिली दाद कुबूल कीजिये

  5. वाह, वाह ! खूबसूरत ग़ज़ल द्विजेन्द्र द्विज जी !
    दिली दाद क़ुबूल कीजिये !!

  6. ले दे कि बस हमारा जुनूं था हमारे साथ
    इसके सिवा कुछ और तो रख्त़े सफर न था

    मोहतरम दिव्ज साहिब बेहतरीन रख़्ते सफर के लिये दिली मुबारक बाद क़ुबूल फरमाएं –

    मुनव्वर अली ‘ताज’

  7. पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था
    वक़्ते-सहर था दोस्तो ! नूरे-सहर न था
    सानी मिसरा क्या कमाल का मिसरा है !!! मतला खूब जमा !!!
    इक धुन्ध है सहर की कहानी के नाम पर
    महफूज़ अब तलक हैं सियाहे के बाब सब –मयंक
    उन पे कभी कहीं भी मुझे कोई डर न था
    जिन रास्तों पे कोई मिरा हमसफ़र न था
    अहबाब मुड़ गये हैं मेरा साथ छोड़ कर
    दिल खुश हुआ है राह को पुरख़ार देखकर !!! –मयंक
    द्विज साहब बधाई हो तनहा सफर की ख़ुश्किस्मत है आप !!
    ले दे बस हमारा जुनूँ था हमारे साथ
    इसके सिवा कुछ और तो रख़्ते-सफ़र न था
    आय हय हय !! सफर तो पता ही नहीं चला होगा कब कट गया !! ये शेर बहुत भाया !! बहुत !!
    हम जुस्तजू में उसकी तमाशा तो बन गये
    दीदावरों की भीड़ में वो दीदावर न था
    हरिक मोड़ पर चाँद सूरज टँगे थे
    ज़रूरत हमें फिर भी थी रोशनी की –राजेन्द्र तिवारी –कानपुर
    उसकी गली पे हम तो दिलो-जाँ से थे निसार
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    एक जैसी दास्ताँ है !1 इस मिसरे पर बेशतर गिरह घूम कर यहीं गिरी हैं !! क्या सब एक ही गली के बीमार हैं यहाँ ):
    दस्ते-करम पे सदक़े तुम्हारे ऐ चारागर !
    गहरा तो इस क़दर मिरा ज़ख़्मे-जिगर न था
    सही पहचाना चारगर को !! अब चारगरी प्रोफेशन नहीं बिज़नेस है भाई !!!
    बस रहनुमा पे उँगली उठाने की देर थी
    पहले हमारा रास्ता यूँ पुरख़तर न था
    सही पहचाना रहनुमा को !!! अब रहनुमाई धन्धा है रहमत नहीं !! एक शेर — कहाँ पहुँचायेगी ये रहनुमाई मुल्क को यारों
    जिधर बेग़म बताती है उधर सरदार जाता है –):
    बाहर से हमने ख़ुद को पुकारा जो बार-बार
    अन्दर हमारे नाम का कोई बशर न था
    गहरी बात कही मालिक आपने गहरी बात !! हमारे भीतर का अहसास खला तक पहुम्च गया है – ये हासिल है कि ज़ियाँ !!!
    क्यों फिर वहीं उम्मीद की कोंपल दिखायी दी
    सहरा की रेत में जहाँ कोई शजर न था
    उमीद की बात है !!
    लाये थे हम जो सात समन्दर खँगाल कर
    उस दिल-गुहर का कोई यहाँ दीदावर न था
    गन्धी गन्ध गुलाब की गँवई गाहक कौनु !!!!!
    द्विज साहब !!1 खूब शेर कहे खूब –बधाई –मयंक

  8. मतले ने मार दिया….आगे क्‍या कहूं भाई साहब।
    सारी ग़ज़ल बहुत खू़ब।
    बधाई
    सादर
    नवनीत

  9. dwij sahab poori ki poori ghazal behad shaandaar hai..mere liye mushayre me aayi sabse acchi ghazalon me se ek ….lagbhag har she’r pasand aaya..matle se mukhatib hote hi ehsaas ho gaya ki main ek shaandar ghazal padhne jaa raha hun..dili daad…

  10. पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था
    वक़्ते-सहर था दोस्तो ! नूरे-सहर न था
    आ. द्विज सा. ,क्या ही मंजूम फ़साहत भरा मतला है ,मजा आ गया| तहेदिल से दाद कबूल फरमाएं |
    पूरी ग़ज़ल बेशकीमती है लेकिन इन मिसरों का तो कोई मोल भी नहीं लगा सकता |

    ले दे बस हमारा जुनूँ था हमारे साथ
    इसके सिवा कुछ और तो रख़्ते-सफ़र न था ……….. वा………ह

    हम जुस्तजू में उसकी तमाशा तो बन गये
    दीदावरों की भीड़ में वो दीदावर न था …………… क्या कहने !

    दस्ते-करम पे सदक़े तुम्हारे ऐ चारागर !
    गहरा तो इस क़दर मिरा ज़ख़्मे-जिगर न था

    बस रहनुमा पे उँगली उठाने की देर थी
    पहले हमारा रास्ता यूँ पुरख़तर न था . ……….. ढेरों दाद

    बाहर से हमने ख़ुद को पुकारा जो बार-बार
    अन्दर हमारे नाम का कोई बशर न था

    देखा जो अपनी आँखों में आँखों को डाल कर
    अक्सर हमारे काँधों पे अपना ही सर न था
    बहुत बहुत मुबारकबाद |
    सादर

  11. अभी तक की सबसे अच्छी ग़ज़लों में से एक ! मतला लाजवाब! तमाम अश’आर बहुत ख़ूब!

  12. ले दे K बस हमारा जुनूँ था हमारे साथ
    इसके सिवा कुछ और तो रख़्ते-सफ़र न था

    उसकी गली पे हम तो दिलो-जाँ से थे निसार
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

    बाहर से हमने ख़ुद को पुकारा जो बार-बार
    अन्दर हमारे नाम का कोई बशर न था

    क्यों फिर वहीं उम्मीद की कोंपल दिखायी दी
    सहरा की रेत में जहाँ कोई शजर न था WAAH KYA KAHNE ASH’AAR BHI KHOOB AUR GIRAH BHI KHOOB, द्विजेन्द्र द्विज JI MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

  13. Dwij sahab master stroke ….
    . ek ek sher zabaan ki chashni me dooba hua….
    is bharpoor ghazal ke liye bharpoor daad qubool karen…

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