9 टिप्पणियाँ

T-17/20 ऐसा नहीं कि अपना कोई राहबर न था-फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’

ऐसा नहीं कि अपना कोई राहबर न था
था तो ज़ुरूर हाँ वो मगर मोतबर न था

ऐसा नहीं कि हाथ में मेरे हुनर न था
लेकिन किसी हुनर में भी मैं मास्टर न था

निकले हैं डूब कर कई दरिया-ए-इश्क़ से
मजनूं के जैसा कोई मगर तर-ब-तर न था

सब ज़ख्म देने वाले ही थे तिरे शह्र में
मरहम लगाने वाला कोई घाव पर न था

मकरो-फ़रेब, झूट के पैकर थे सारे लोग
क़ानून क्या है उनको ख़ुदा का भी डर न था

हम जिसके ख़ैर-ख़ाह थे उसकी ज़बान पर
दुनिया का तज़करा था हमारा मगर न था

दो बोल मीठे बोल के तुम फिर भी चल दिये
तुमको पता था इतने में अपना गुज़र न था

बर्बाद हो के रह गया मैं जिसके वास्ते
अफ़सोस उसको कुछ भी मिरे हाल पर न था

उसके मकां का सबको पता हम दिया किये
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

शाहों कि सारी शान तो थी अपने पास भी
‘सैफ़ी’ बस अपने सर पे बस इक ताज भर न था

फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’ 09826134249

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9 comments on “T-17/20 ऐसा नहीं कि अपना कोई राहबर न था-फ़ज़ले-अब्बास ‘सैफ़ी’

  1. बहुत खूब सैफ़ी साहब, दाद कुबूल कीजिए

  2. दो बोल मीठे बोल के तुम फिर भी चल दिये
    तुमको पता था इतने में अपना गुज़र न था
    kya accha she’r hua hai saifi sahab… daad qubulen

  3. ऐसा नहीं कि अपना कोई राहबर न था
    था तो ज़ुरूर हाँ वो मगर मोतबर न था
    सियासतदाँ ,चार:गर, क्या कहे आज बदनफरोश रूह के रहबर बन गये है !!! मोतबर कोई नहीं !!
    ऐसा नहीं कि हाथ में मेरे हुनर न था
    लेकिन किसी हुनर में भी मैं मास्टर न था
    ज़दीद कहन है !! मास्टर के म आनी यहाँ माहिर से है – खूब काफिया उठाया है –डाक़्टर, नर्स, ट्रेन, प्रोफेसर, रोड , बस , होटल , कार –अनेक शब्द अब अंग्रेज़ी के नहीं हिन्दुस्तानी भाषा के हैं –इनको संवाद मे जगह मिलती है तो शाइरी मे भी मिलनी चाहिये !! खूब !!
    निकले हैं डूब कर कई दरिया-ए-इश्क़ से
    मजनूं के जैसा कोई मगर तर-ब-तर न था
    मजनूँ और कोहकन मक़तबे इश्क़ के मीर और ग़ालिब है !!! तस्लीम !!
    सब ज़ख्म देने वाले ही थे तिरे शह्र में
    मरहम लगाने वाला कोई घाव पर न था
    यह अहसास सभी का है लेकिन शाइर हस्सास तबीयत होते हैं उनके बयान में शिद्दत महसूस की जा सकती है !!!
    मकरो-फ़रेब, झूट के पैकर थे सारे लोग
    क़ानून क्या है उनको ख़ुदा का भी डर न था
    कलियुग है !!
    हम जिसके ख़ैर-ख़ाह थे उसकी ज़बान पर
    दुनिया का तज़करा था हमारा मगर न था
    मस्लहत का तकाज़ा है –लेकिन हँसिये !! क्योकि –
    बेखुदी बेसबब नही गालिब
    कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है –ग़ालिब
    दो बोल मीठे बोल के तुम फिर भी चल दिये
    तुमको पता था इतने में अपना गुज़र न था
    एक शेर बशीर का !!
    वो जैसे सर्दियों मे गर्म कपड़े दे फकीरो को
    लबो पर मुस्कुराहट सी मगर कैसी हिकारत सी –बशीर
    बर्बाद हो के रह गया मैं जिसके वास्ते
    अफ़सोस उसको कुछ भी मिरे हाल पर न था
    लिख कर हमारा नाम ज़मीं पर मिटा दिया
    उनका था खेल, ख़ाक मे हमको मिला दिया
    उसके मकां का सबको पता हम दिया किये
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    अच्छी गिरह है !!
    शाहों कि सारी शान तो थी अपने पास भी
    ‘सैफ़ी’ बस अपने सर पे बस इक ताज भर न था
    सैफ़ी हमारे सर पे बस इक ताज भर न था…. वाह !! वाह !!! बेताज बादशाह थे हम !! सैफ़ी साहब !! बहुत ख़ूब बहुत ख़ूब !! ग़ज़ल पर दाद !!! –मयंक

  4. umda ghazal hui he….sabhi sher lajwaab heN
    Lekin matle meN eeta he….is par ghaur farmaayeN

  5. वाह जनाब सैफ़ी साहब।
    अच्‍छी ग़ज़ल हुई।
    सादर
    नवनीत

  6. सब ज़ख्म देने वाले ही थे तिरे शह्र में
    मरहम लगाने वाला कोई घाव पर न था…..उम्दा ग़ज़ल है सैफी साहब…..मुबारकबाद…

  7. ऐसा नहीं कि हाथ में मेरे हुनर न था
    लेकिन किसी हुनर में भी मैं मास्टर न था

    शाहों कि सारी शान तो थी अपने पास भी
    ‘सैफ़ी’ बस अपने सर पे बस इक ताज भर न था
    आ. सैफ़ी सा.
    पूरी ग़ज़ल लाजवाब है | ये अशहार तो काफ़ी असरदार हैं |ढेरों दाद कबूल फरमाएं

  8. UMDA GHAZAL KE LIYE MUBAARAKBAAD, SAIFI SAHAB, MAQTE KA DOOSRA MISRA TO AAP NE MUJHE YU’N SUNAAYA THA, ” SAIFI HAMAARE SAR PE BAS IK TAAJ BHAR NA THA ” AAP KE MAQTE ME’N 2-2 BAS KYA KAR RAHE HAI’N ?

  9. aifi sahab kya kahne
    Behad umda ghazal hui daad qubool karen ..bas ek sher se mujhe ikhtelaf hai
    Majnoo ke jaisa koi…

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