20 टिप्पणियाँ

T-17/19 ये ठीक है कि यूं तो कभी दर-ब-दर न था-नवनीत शर्मा

ये ठीक है कि यूं तो कभी दर-ब-दर न था
बस रह रहा था जिसमें वही मेरा घर न था

बाद उसके मंज़िलों की तड़प ख़त्‍म हो गयी
मंज़िल था एक शख्‍़स कोई राह भर न था

नाराज़ अपने आप से जिस रोज़ मैं हुआ
बाद उसके कोई भी तो मेरा हमसफ़र न था

रातें हज़ार चांद ने काटी हैं मेरे साथ
छूने में फा़सला तो मगर मुख्‍़तसर न था

ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था

दिल पर हमेशा जिसकी हुकू़मत बनी रही
उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था

सूरज के सब सताये हुए घर में जा घुसे
संवरी जो चांदनी तो कोई दीदावर न था

होंठों से दिल की बात लरज़ कर पलट गयी
पर ये भी सच नहीं है कि दिल में ग़दर न था

तेरे ग़मों में चहकूं, ख़ुशी में रहूं उदास
हां, हां! बहुत बुरा था मैं इतना मगर न था

आया जो लेने जान को ग़म कह गया मुझसे
जो चारागर था तेरा वही चारागर न था

जिसके सबब से जीने की आदत हुई मुझे
वो अजनबी था कोई मेरा मोतबर न था

माना कि दूरियों में सदा घुट के रह गयी
ये झूठ है कि मैं भी तिरा मुंतज़र न था

मैं था वफ़ा सरापा, ख़मोशी था दर्द की
जुज़ इनके कोई दाग़ मिरी रूह पर न था

झेले हैं उसके वार हमेशा से दोस्‍तो
सब कुछ वो था ज़रूर जो चेहरा मगर न था

थी ज़िन्दगी हमारे लिए ऐसी रहगुज़र
जिसके क़रीब सूखा हुआ भी शजर न था

ख़ाबों में मुझको मिलता रहा है वो उम्रभर
जिसका कोई पयाम मेरे नाम पर न था

‘नवनीत’ आन पहुंचे हो तुम किस मक़ाम पर
तय जिसको कर चुके हो, तुम्‍हारा सफ़र न था

नवनीत शर्मा 09418040160

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20 comments on “T-17/19 ये ठीक है कि यूं तो कभी दर-ब-दर न था-नवनीत शर्मा

  1. बहुत खूब नवनीत साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. Wah Navneet bhaiya. .Kya badhiya ghazal kahi hai aapne. ..nihayat umdaa

    ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
    देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था

    दिल पर हमेशा जिसकी हुकू़मत बनी रही
    उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था

    Wah wah

    -Kanha

  3. क्या कहने वाह वाह
    सभी शेर खूबसूरत
    इस सुंदर ग़ज़ल के लिए दिली दाद कुबूल कीजिये नवनीत जी

  4. भाई

    ग़ज़ल तो बार-बार पढ़ी लेकिन अस्त-व्यस्तता के कारण
    इस पर कुछ लिखने का समय नहीं निकाल सका. भाई मयंक ग़ज़ल में बहुत गहरे उतर कर या यूँ कहें कि ग़ज़ल को ज़ेह्नो-दिल में उतार कर बहुत विद्वतापूर्ण टिप्पणी करते हैं. उनकी टिप्पणी के साथ ग़ज़ल का आनन्द और भी बढ़ जाता है. मैं तो बस शेर ही क्वोट कर सकता हूँ. ये सारे शेर बहुत पसन्द आये. अल्लाह करे ज़ोरे=कलम और ज़ियादा!

    ये ठीक है कि यूं तो कभी दर-ब-दर न था
    बस रह रहा था जिसमें वही मेरा घर न था

    बाद उसके मंज़िलों की तड़प ख़त्‍म हो गयी
    मंज़िल था एक शख्‍़स कोई राह भर न था

    नाराज़ अपने आप से जिस रोज़ मैं हुआ
    बाद उसके कोई भी तो मेरा हमसफ़र न था

    रातें हज़ार चांद ने काटी हैं मेरे साथ
    छूने में फा़सला तो मगर मुख्‍़तसर न था

    ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
    देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था

    दिल पर हमेशा जिसकी हुकू़मत बनी रही
    उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था

    सूरज के सब सताये हुए घर में जा घुसे
    संवरी जो चांदनी तो कोई दीदावर न था

    होंठों से दिल की बात लरज़ कर पलट गयी
    पर ये भी सच नहीं है कि दिल में ग़दर न था

    तेरे ग़मों में चहकूं, ख़ुशी में रहूं उदास
    हां, हां! बहुत बुरा था मैं इतना मगर न था

    आया जो लेने जान को ग़म कह गया मुझसे
    जो चारागर था तेरा वही चारागर न था

    जिसके सबब से जीने की आदत हुई मुझे
    वो अजनबी था कोई मेरा मोतबर न था

    माना कि दूरियों में सदा घुट के रह गयी
    ये झूठ है कि मैं भी तिरा मुंतज़र न था

    मैं था वफ़ा सरापा, ख़मोशी था दर्द की
    जुज़ इनके कोई दाग़ मिरी रूह पर न था

    झेले हैं उसके वार हमेशा से दोस्‍तो
    सब कुछ वो था ज़रूर जो चेहरा मगर न था

    थी ज़िन्दगी हमारे लिए ऐसी रहगुज़र
    जिसके क़रीब सूखा हुआ भी शजर न था

    ख़ाबों में मुझको मिलता रहा है वो उम्रभर
    जिसका कोई पयाम मेरे नाम पर न था

    ‘नवनीत’ आन पहुंचे हो तुम किस मक़ाम पर
    तय जिसको कर चुके हो, तुम्‍हारा सफ़र न था

  5. ये ठीक है कि यूं तो कभी दर-ब-दर न था
    बस रह रहा था जिसमें वही मेरा घर न था
    नवनीत भाई !! यह ख्याल थोड़े मुख्तलिफ पैरहन में इसी तरही की रहगुज़र में मेरे हमराह भी रहा है !! इसकी निस्बत से मैं आशना हूँ –इसकी खुश्बू से भी !!! बहुत खूब !!

    बाद उसके मंज़िलों की तड़प ख़त्‍म हो गयी
    मंज़िल था एक शख्‍़स कोई राह भर न था
    सानी मिसरे की गढ़न में — राह भर — अलफ़ाज़ असर दार कर गए शेर को

    नाराज़ अपने आप से जिस रोज़ मैं हुआ
    बाद उसके कोई भी तो मेरा हमसफ़र न था
    मन के हारे हार है मन के जीते जीत।

    ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
    देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था
    तनहाई में खुद को तकसीम करना और अपने टुकड़ों में खुद को तलाशना !! वाह नवनीत भाई !! अच्छी शाइरी की सनद है ये आदत !!!

    सूरज के सब सताये हुए घर में जा घुसे
    संवरी जो चांदनी तो कोई दीदावर न था
    चराग जलाते ही बीनाई बुझाने लगती है !!!! अलमिया है ज़िंदगी का तश्बीह खूब तराशी है शेर में

    होंठों से दिल की बात लरज़ कर पलट गयी
    पर ये भी सच नहीं है कि दिल में ग़दर न था
    इस शेर का केंद्रीय भाव “ज़ब्त” है –जो अलफ़ाज़ ने उभारा है !!

    तेरे ग़मों में चहकूं, ख़ुशी में रहूं उदास
    हां, हां! बहुत बुरा था मैं इतना मगर न था
    इस शेर की मासूमियत –इसके लहजे में आई है और संवाद शैली में शेर अच्छा लग रहा है

    जिसके सबब से जीने की आदत हुई मुझे
    वो अजनबी था कोई मेरा मोतबर न था

    तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
    जहां उम्मीद हो उसकी वहाँ नहीं मिलता –निदा

    माना कि दूरियों में सदा घुट के रह गयी
    ये झूठ है कि मैं भी तिरा मुंतज़र न था

    सच ये है दूरियों में सदा घुट के रह गयी
    ये झूठ है कि मैं भी तिरा मुंतज़र न था
    —————-वाह !! हासिल ग़ज़ल शेर है ये तो !!!

    थी ज़िन्दगी हमारे लिए ऐसी रहगुज़र
    जिसके क़रीब सूखा हुआ भी शजर न था
    इस शेर की भी जितनी तारीफ़ की जाय कम होगी !!! इसका मंज़र बहुत स्पष्ट है !!

    ‘नवनीत’ आन पहुंचे हो तुम किस मक़ाम पर
    तय जिसको कर चुके हो, तुम्‍हारा सफ़र न था

    नवनीत भाई !! जिन अशआर पर तबसरा नहीं है वो भी दाद के हकदार है !! कई शेर कहे है आपने और -खूब कहे है –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      प्रणाम।
      आप जिस सह्दयता के साथ टिप्‍पणी करते हैं और बालक की यानी मेरे म़आमले में मेरी सद्वृत्तियों को उभारते हैं, उससे बालक की कमियां तो स्‍वत: ही ओझल हो जाती हैं। अपनी ग़ज़ल पर आपसे टिप्‍पणी पाकर जो साहस बंधता है और तसल्‍ली आती है वह बेहतर लिखने की कोशिश पर ज़ोर देती हैं।
      करम बना रहे।
      अगली बार बेहतर ग़ज़ल कहने का प्रयास करूंगा।
      सादर
      नवनीत

  6. बहुत उम्दा ग़ज़ल है नवनीत साहब……बहुत मुबारकबाद….

  7. इस मुश्किल ज़मीन में सत्रह शेर! क्या ख़ूब नवनीत भाई! बाकमाल ग़ज़ल!

  8. 17sher aur sab ke sab achche… waaah waah waah
    Is achchi ghazal ke liye achchi si mubarakbaad qubool karen bhai…

  9. नाराज़ अपने आप से जिस रोज़ मैं हुआ
    बाद उसके कोई भी तो मेरा हमसफ़र न था

    रातें हज़ार चांद ने काटी हैं मेरे साथ
    छूने में फा़सला तो मगर मुख्‍़तसर न था

    ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
    देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था
    आ.नवनीत भाईसाहब ,बेहतरीन ग़ज़ल है ,हर शेर में विविधता है | लगभग सभी काफियों पर लासानी अशहार हुए हैं|हार्दिक बधाई स्वीकार करें |
    सादर

  10. नाराज़ अपने आप से जिस रोज़ मैं हुआ
    बाद उसके कोई भी तो मेरा हमसफ़र न था

    ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
    देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था

    दिल पर हमेशा जिसकी हुकू़मत बनी रही
    उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था

    सूरज के सब सताये हुए घर में जा घुसे
    संवरी जो चांदनी तो कोई दीदावर न था

    तेरे ग़मों में चहकूं, ख़ुशी में रहूं उदास
    हां, हां! बहुत बुरा था मैं इतना मगर न था
    NAUNEET SHARMA JI ACHHE SHER NIKAALE HAI’N AAP NE.BADHAAI SWEEKAR KARE’N.

  11. bharpoor ghazal hui hai navneeet bhai…
    मैं था वफ़ा सरापा, ख़मोशी था दर्द की
    जुज़ इनके कोई दाग़ मिरी रूह पर न था

    थी ज़िन्दगी हमारे लिए ऐसी रहगुज़र
    जिसके क़रीब सूखा हुआ भी शजर न था
    ye do she’r bataure-khaas pasand aaye… daad qubulen

  12. Navneet Sharma Sahab badi taveel ghazal kahi hai aapne aur majhi hui ghazal kahi hai… ye sher behad pasand aae..

    ये किससे हमकलाम रहा हूं मैं रात भर
    देखा निकल के खुद से तो कोई बशर न था

    सूरज के सब सताये हुए घर में जा घुसे
    संवरी जो चांदनी तो कोई दीदावर न था

    मैं था वफ़ा सरापा, ख़मोशी था दर्द की
    जुज़ इनके कोई दाग़ मिरी रूह पर न था

    ‘नवनीत’ आन पहुंचे हो तुम किस मक़ाम पर
    तय जिसको कर चुके हो, तुम्‍हारा सफ़र न था

    behad mubarkbaad!! – Asif

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