8 टिप्पणियाँ

T-17/18 उसकी किसी भी बात में कुछ भी असर न था-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

उसकी किसी भी बात में कुछ भी असर न था
था तो अमीरे-शहर मगर मोतबर न था

जो बात साफ़-साफ़ थी मुंह से निकल गयी
वैसे भी तुहमतों का मुझे कोई डर न था

शामिल था मेरे ख़ून में रिश्तों का एहतराम
शिकवा किसी से मुझको किसी तौर पर न था

फिर भी सुकूं की नींद मयस्सर न हो सकी
हालाँकि ज़िन्दगी में कहीं शोरो-शर न था

महफ़िल में सैकड़ों थे हसीं से हसीनतर
लेकिन कोई भी आपसे जाज़िब-नज़र न था

अपनी नज़र से मैं तिरे दिल तक पहुँच सकूँ
अफ़सोस तुझसे रब्त मिरा इस क़दर न था

इक उम्र कट गयी मिरे दिन भी गुज़र गये
लेकिन मिरा नसीब कभी औज पर न था

ये और बात है कि मैं आया न राह पर
ऐसा नहीं कि कोई मिरा राहबर न था

अफ़सोस है कि तूने भी मेरी ख़बर न ली
जबकि मिरी वफ़ाओं से तू बेख़बर न था

बेघर थे चंद लोग अगर मेरे गाँव में
क्या आपके नगर में कोई दर-ब-दर न था

माँ की दुआ सफ़र में मिरे साथ-साथ थी
आफ़ाते-नागहानी का कुछ मुझको डर न था

उसने भी हमसफ़र के बिना तय किया सफ़र
‘कौसर’ तिरे भी साथ कोई हमसफ़र न था

अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ 09300212960

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8 comments on “T-17/18 उसकी किसी भी बात में कुछ भी असर न था-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

  1. बहुत खूब कौसर साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. शामिल था मेरे ख़ून में रिश्तों का एहतराम
    शिकवा किसी से मुझको किसी तौर पर न था
    संस्कारगत चेतना !! शाइरी मे आनी चाहिये !! नस्लो के लिये सनद के तौर पर !! श्फ़्फ़ाफ़ पानियों जैसा बयान है !!
    फिर भी सुकूं की नींद मयस्सर न हो सकी
    हालाँकि ज़िन्दगी में कहीं शोरो-शर न था
    फराज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नही
    मगर करार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं – अहमद फराज़ !!!
    महफ़िल में सैकड़ों थे हसीं से हसीनतर
    लेकिन कोई भी आपसे जाज़िब-नज़र न था
    हम एक ख़्वाब हैं बेदारी चश्मे साक़ी के
    कोई न जान सका रूशनास महफिल मे -मयंक

    अपनी नज़र से मैं तिरे दिल तक पहुँच सकूँ
    अफ़सोस तुझसे रब्त मिरा इस क़दर न था
    आशनाई को उसका मुक़ाम नहीं मिला !!
    इक उम्र कट गयी मिरे दिन भी गुज़र गये
    लेकिन मिरा नसीब कभी औज पर न था
    बेशतर ज़िन्दगियों का अहसास यही होता है !!!
    ये और बात है कि मैं आया न राह पर
    ऐसा नहीं कि कोई मिरा राहबर न था
    दिल की ठिठाई या मन के चलयमान होने के सबब ऐसा होता है !! वर्ना रिसाले –और वक़्त रहबर के रूप मे हमेशा उपलब्ध रहते हैं !!!
    बेघर थे चंद लोग अगर मेरे गाँव में
    क्या आपके नगर में कोई दर-ब-दर न था
    अच्छा सवाल पूछा है !!
    माँ की दुआ सफ़र में मिरे साथ-साथ थी
    आफ़ाते-नागहानी का कुछ मुझको डर न था
    हासिले गज़ल शेर है …
    अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
    सफर में जब भी रहता हूँ दुआ भी साथ चलती है –मुनव्वर
    उसने भी हमसफ़र के बिना तय किया सफ़र
    ‘कौसर’ तिरे भी साथ कोई हमसफ़र न था
    बेहतरीन शेर है ये मुहब्बत के एक अछूते पहलू को उजगर करता शेर है – दाद !! दाद !! इस शेर पर
    अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ साहब !! बधाई !! –मयंक

  3. कौसर साहब ख़ूब ग़ज़ल हुई है! दाद क़ुबूल हो!

  4. kausar sahab,..poori ghazal bahut umda hui hai… waah waah…

  5. माँ की दुआ सफ़र में मिरे साथ-साथ थी
    आफ़ाते-नागहानी का कुछ मुझको डर न था

    उसने भी हमसफ़र के बिना तय किया सफ़र
    ‘कौसर’ तिरे भी साथ कोई हमसफ़र न था

    bahut sundar ghazal hai Kausar Sahab…..mubaarakbaad qubool kijiye…

  6. अफ़सोस है कि तूने भी मेरी ख़बर न ली
    जबकि मिरी वफ़ाओं से तू बेख़बर न था

    बेघर थे चंद लोग अगर मेरे गाँव में
    क्या आपके नगर में कोई दर-ब-दर न था
    आ. कौसर साहब अच्छी ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  7. जनाब अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ साहब,
    ग़ज़ल के लिए दाद कबूल करें।
    सादर
    नवनीत

  8. KOUSAR SAHAB ! TARAH PAR AAP NE ACHHI GHAZAL KAHI HAI , TAMAAM SHER ACHHE HAIN. KHAAS KAR YE SHER TO BEHAD PASAND AAYE

    ये और बात है कि मैं आया न राह पर
    ऐसा नहीं कि कोई मिरा राहबर न था

    माँ की दुआ सफ़र में मिरे साथ-साथ थी
    आफ़ाते-नागहानी का कुछ मुझको डर न था IS SHER KI TO JITNI BHI DAAD DI JAAYE KAM HAI.

    उसने भी हमसफ़र के बिना तय किया सफ़र
    ‘कौसर’ तिरे भी साथ कोई हमसफ़र न था

    WAAH WAAH, ACHHI GHAZAL KE LIYE MUBAARAKBAAD PESH KARTA HU’N, QABOOL KARE’N.

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