15 टिप्पणियाँ

T-17/17 गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बेखबर न था-रोहित सोनी ‘ताबिश’

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बेखबर न था
फिर भी मेरी वफ़ाओं का उस पर असर न था

मैं इस फरेबे-हुस्न से खुद बाख़बर न था
वो था तो मेरे साथ बज़ाहिर, मगर न था

अपना उसे बना न सका मैं तमाम उम्र
मुझमें बहुत हुनर थे मगर ये हुनर न था

लब थे ख़मोश ख़ौफ़ से इज़हारे-इश्क़ के
पर आंसुओं को मेरे किसी का भी डर न था

सारे जहां की ख़ाक को हम छानने के बाद
लौटे तो देखा, अपना घर अब अपना घर न था

बीमारे-ग़म के वास्ते क्या मौत के सिवा
कोई इलाज दह्र में ए चारागर न था

होती भी फ़त्ह कैसे मिरी जब थे साथ-साथ
वो लोग जिनके शानों पे ख़ुद अपना सर न था

क्या मैकदे का नज़्म भी तब्दील हो गया
साक़ी जो दौरे-जाम उधर था, इधर न था

क्यों उसने की न ज़हमते-चारागरी क़ुबूल
क्या उसके पास चारा-ए-ज़ख्मे-जिगर न था

काफी था मुझको राहे-वफ़ा में ख़याले-यार
‘ताबिश’ बला से कोई मिरा हमसफ़र न था

-रोहित सोनी ‘ताबिश’ 09599247452

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15 comments on “T-17/17 गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बेखबर न था-रोहित सोनी ‘ताबिश’

  1. बहुत खूब रोहित साहब, दाद कुबूलें

  2. अपना उसे बना न सका मैं तमाम उम्र
    मुझमें बहुत हुनर थे मगर ये हुनर न था

    लब थे ख़मोश ख़ौफ़ से इज़हारे-इश्क़ के
    पर आंसुओं को मेरे किसी का भी डर न था

    सारे जहां की ख़ाक को हम छानने के बाद
    लौटे तो देखा, अपना घर अब अपना घर न था

    wahh ..Kya kehne. .
    -Kanha

  3. ख़ुशामदीद रोहित साहब! एक अच्छी ग़ज़ल के लिए भरपूर दाद!

  4. रोहित जी आपसे एक अर्से बाद गज़ल के हवाले से मुलाकात हो रही है !! बड़ा आश्चर्य्मिश्रित हर्ष हुआ मुझे !! इस पोर्टल पर आगे आने वाली नशिस्तो मे भी शिरकत कीजिये !! पुराने संवाद जो हमारे दर्मियान हुये उनकी भी याद ताज़ा हुई !! स्वागत है !!!
    गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बेखबर न था
    फिर भी मेरी वफ़ाओं का उस पर असर न था
    आसानी से अच्छा मतला कह दिया है !!!
    मैं इस फरेबे-हुस्न से खुद बाख़बर न था
    वो था तो मेरे साथ बज़ाहिर, मगर न था
    काफी अच्छा शेर निकाला है तस्व्वुफ़ का भी भरपूर रंग है है शेर मे !!
    लब थे ख़मोश ख़ौफ़ से इज़हारे-इश्क़ के
    पर आंसुओं को मेरे किसी का भी डर न था
    सानी मिसरा एक मुकम्मल बयान है!!!
    सारे जहां की ख़ाक को हम छानने के बाद
    लौटे तो देखा, अपना घर अब अपना घर न था
    वक्त का दरिया बहुत कुछ बहा ले जाता है !! वक़्फा कभी कभी राबते में बहुत भारी पडता है !! बडे गहरे रँग धुधला जाते है !! अच्छा शेर कहा !!
    होती भी फ़त्ह कैसे मिरी जब थे साथ-साथ
    वो लोग जिनके शानों पे ख़ुद अपना सर न था
    दौरे हाज़िर का एक मक़्बूल मंज़र है शेर मे !!!! केजरिया रंग भी है शेर मे !!!
    काफी था मुझको राहे-वफ़ा में ख़याले-यार
    ‘ताबिश’ बला से कोई मिरा हमसफ़र न था
    बहुत खूब इस शेर का लहजा क्या खूब है !!! बला ने रंग दिया है शेर मे !! ज़ुबान भी !!
    -रोहित जी !! आपकी ज़ुबान बहुत अपील करती है कहन भी !! लफ़्ज़ पर आगे भी आपको देखना चाहेगे हम सब !! गज़ल पर बधाई !! –मयंक

  5. रचे मिरे ख़ुलूस से वो बेखबर न था
    फिर भी मेरी वफ़ाओं का उस पर असर न था

    मैं इस फरेबे-हुस्न से खुद बाख़बर न था
    वो था तो मेरे साथ बज़ाहिर, मगर न था

    अपना उसे बना न सका मैं तमाम उम्र
    मुझमें बहुत हुनर थे मगर ये हुनर न था
    आ. रोहित साहब ,बहुत ही उम्दा ग़ज़ल और लाज़वाब अशहार हुए हैं
    और इस शेर ने तो जान निकाल दी ,,वारी जाऊं

    होती भी फ़त्ह कैसे मिरी जब थे साथ-साथ
    वो लोग जिनके शानों पे ख़ुद अपना सर न था
    दिल की गहराइयों से दाद कबूल फरमाएं|

  6. lafz par swagat hai rohit ji…. kaisi acchi ghazal.. kaisi acchi zabaan… daad qubulen…

  7. ताबिश साहब,
    कैसी अच्‍छी ग़ज़ल कही है। वाह!

  8. BHOT KHOOB TABISH SAHAB. ACCHI GHAZAL KAHI HAI. KHAS TOUR PAR YE SHER. ‘ MAIN IS FAREB-E-HUSN SE KHUD BEKHABAR NA THA. DAD QUBOOL FARMAYEN.

  9. -रोहित सोनी ‘ताबिश’ SAHAB ! PAHLI BAAR AAP KI GHAZAL PADHI JANAAB, NIHAAYAT HI SAAF SUTHRI GHAZAL HAI, MATLA TA MAQTA POORI GHAZAL UMDA HAI, MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

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