21 टिप्पणियाँ

T-17/16 साथी न था कोई भी कहीं भी शजर न था-‘खुरशीद’ खैराड़ी

साथी न था कोई भी कहीं भी शजर न था
तनहा था मैं सफ़र भी मिरा मुख़्तसर न था

मुझको सँवारती थी बसीरत हर इक जगह
बेघर तो था मगर मैं कभी बेबसर न था

बातें नसीमे-सुब्ह तबस्सुम शमीमे-गुल
तेरे सिवा चमन में कोई दीदावर न था

अब बैठती नहीं है गुलों पर भी तितलियाँ
छलनी कभी यक़ीन का दिल इस कदर न था

दुनिया में पत्थरों का कभी क़हत था नहीं
गोया इबादतों का मुझी में हुनर न था

ख़ुशबू तिरे जमाल की थी ज़ह्न में भरी
इस तरह दिल पे बू-ए-अना का असर न था

अचरज नहीं जो राख है बस्ती सराब की
होठों पे किस के जलता हुआ इक शरर न था

दीवार थी न बाम दरीचा-ओ-दर न थे
बेघर तो लोग वे भी न थे जिनके घर न था

पागल बनाया क़ामते-दिलदार ने मुझे
मुझमें तो शायरी का ज़रा भी हुनर न था

अश्कों की एक नहर मिरे गाल पर तो थी
दीदा-ए-तर से सहरा-ए-लब तर-ब-तर न था

पुरदाद तेरे जुरअते-इफ़शा-ए-राज़ पर
मुझको भी एतिबार तिरा मोतबर न था

मुझको यक़ीन भी था तिरी बारगाह पर
मुझमें ज़रा सा ज़ब्ते-फ़ुग़ाँ भी मगर न था

था चश्मे-नूर ग़ारे-सियाही के पार ही
उसको ख़बर थी फिर भी वो अहले-सफ़र न था

दश्ते-वफ़ा में गाम भटकते रहे मगर
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुजर न था’

‘खुरशीद’ जी जलाते कहीं भी चराग़े-दिल
थी रौशनी कहाँ तो अँधेरा किधर न था

‘खुरशीद’ खैराड़ी 09413408422

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21 comments on “T-17/16 साथी न था कोई भी कहीं भी शजर न था-‘खुरशीद’ खैराड़ी

  1. बहुत खूब खुरशीद साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. अब बैठती नहीं है गुलों पर भी तितलियाँ
    छलनी कभी यक़ीन का दिल इस कदर न था….ahaa ..Kya khubsoorat ghazal hui hai khurshid sahab. .Ye she’r to kamal ka hai. ..daad qubule’n
    -Kanha

  3. अचरज नहीं जो राख है बस्ती सराब की
    होठों पे किस के जलता हुआ इक शरर न था

    वाह खुर्शीद साहब पूरी की पूरी ग़ज़ल ही अच्छी हुई है। दिल से कही हुई इस ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई।

  4. खुरशीद साहब पूरी ग़ज़ल उम्दा है. दाद हाज़िर है!

  5. behad umda ghazal hai….दीवार थी न बाम दरीचा-ओ-दर न थे
    बेघर तो लोग वे भी न थे जिनके घर न था…..kya kahne…

  6. Khursheed bhai taveel ghazal main ziyadatar yeh hota h ki kuch sher halke aur bharti k hoteh.. Lekin aapke yahaan aAsia kuch nahi h.. Sabhi aah’aar ek se badhkar ek hain.. Dili daad.. – Asif Amaan

  7. प्रिय ख़ुर्शीद खैराड़ी साहब
    आपकी ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर भाई मयंक अवस्थी जी के बाद क्या तब्सरा करूँ ?
    एक-एक शे’र ज़ेह्नो-दिल पर दस्तक देता हुआ महसूस होता है.
    आपके कलाम का ख़ुरशीद अदब के उफ़क़ पर यूँ ही जल्वानुमा रहे,
    इसी दुआ के साथ,

    ‘द्विज’

  8. खुर्शीद भाई,
    बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    हार्दिक बधाई।
    बाकी जनाब मयंक अवस्‍थी साहब ने जो भी इस ग़ज़ल पर कहा है, उसके बाद कुछ भी कहना दोहराना हो्गा।

    सादर
    नवनीत

  9. khursheed sahab.. ji khush ho gaya.. bahut acchi ghazal kahi hai aapne…waah waah… matla behad psand aaya..

    अचरज नहीं जो राख है बस्ती सराब की
    होठों पे किस के जलता हुआ इक शरर न था
    basti saraab ki… iska jawaab nahi…. kya hi umdaa she’r hai… waah

    अश्कों की एक नहर मिरे गाल पर तो थी
    दीदा-ए-तर से सहरा-ए-लब तर-ब-तर न था
    sahra ko sairaab to samandar hi kar sakega…. kya accha she’r hua hai…….

    था चश्मे-नूर ग़ारे-सियाही के पार ही
    उसको ख़बर थी फिर भी वो अहले-सफ़र न था… ye she’r aur girah bhi bahut pasand aaye…. daad qubulen…

  10. साथी न था कोई भी कहीं भी शजर न था
    तनहा था मैं सफ़र भी मिरा मुख़्तसर न था
    दश्त का सफ़र था और अकेले तय करना था !!! मतला कामयाब है

    मुझको सँवारती थी बसीरत हर इक जगह
    बेघर तो था मगर मैं कभी बेबसर न था
    जिसके पास नज़र है –उसके पास बड़ी चीज़ है

    बातें नसीमे-सुब्ह तबस्सुम शमीमे-गुल
    तेरे सिवा चमन में कोई दीदावर न था
    क्या तश्बीह तराशी है वाह !!! वाह !!

    अब बैठती नहीं है गुलों पर भी तितलियाँ
    छलनी कभी यक़ीन का दिल इस कदर न था
    यकीन का दिल –एक नयी बात है

    दुनिया में पत्थरों का कभी क़हत था नहीं
    गोया इबादतों का मुझी में हुनर न था
    इस शेर के अर्थ दूर तक है — पत्थर से इबादत के जितने रब्त हो सकते है -सब शेर में आये है

    ख़ुशबू तिरे जमाल की थी ज़ह्न में भरी
    इस तरह दिल पे बू-ए-अना का असर न था
    नई कह न पर दाद !!

    पागल बनाया क़ामते-दिलदार ने मुझे
    मुझमें तो शायरी का ज़रा भी हुनर न था

    तारीफ़ क्या हो कामते दिलदार की शिकेब
    तजसीम कर दिया है किसी ने अलाप को

    अश्कों की एक नहर मिरे गाल पर तो थी
    दीदा-ए-तर से सहरा-ए-लब तर-ब-तर न था
    अच्छे सिम्बल्स तलाश किये है

    पुरदाद तेरे जुरअते-इफ़शा-ए-राज़ पर
    मुझको भी एतिबार तिरा मोतबर न था

    जब आंख खुल गयी तो ज़ियां था न सूद था

    मुझको यक़ीन भी था तिरी बारगाह पर
    मुझमें ज़रा सा ज़ब्ते-फ़ुग़ाँ भी मगर न था

    था चश्मे-नूर ग़ारे-सियाही के पार ही
    उसको ख़बर थी फिर भी वो अहले-सफ़र न था
    था चश्मे-नूर ग़ारे-सियाही के पार ही…….. यह जुबान !!! क्या खूब !!

    दश्ते-वफ़ा में गाम भटकते रहे मगर
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुजर न था’
    अच्छी गिरह है

    ‘खुरशीद’ जी जलाते कहीं भी चराग़े-दिल
    थी रौशनी कहाँ तो अँधेरा किधर न था

    ‘खुरशीद’ भाई !!! सँवारती थी बसीरत -बातें नसीमे-सुब्ह तबस्सुम शमीमे-गुल==पुरदाद तेरे जुरअते-इफ़शा-ए-राज़ पर==चश्मे-नूर ग़ारे-सियाही =मुझे लुगत की ज़रुरत पडी –ग़ालिब का ज़माना लगता है लौट आया है –ग़ज़ल पर दाद !! उर्दू जुबां की समृद्धि पर भी !! –मयंक

  11. साथी न था कोई भी कहीं भी शजर न था
    तनहा था मैं सफ़र भी मिरा मुख़्तसर न था

    मुझको सँवारती थी बसीरत हर इक जगह
    बेघर तो था मगर मैं कभी बेबसर न था

    मुझको यक़ीन भी था तिरी बारगाह पर
    मुझमें ज़रा सा ज़ब्ते-फ़ुग़ाँ भी मगर न था WAAH KYA KAHNE KHURSHEED SAHAB, MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N.

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