6 टिप्पणियाँ

T-17/15 माना ऐ दोस्त जज़बा-ए-दिल कारगर न था-मुबारक रिज़वी

माना ऐ दोस्त जज़बा-ए-दिल कारगर न था
कुछ इख़तियार प्यार के इज़हार पर न था

हाँ ना सही नहीं ही सही कुछ तो साथ हो
इसरार मेरे इश्क़ का इक़रार पर न था

क्या आइये कि किस लिये उसकी निगाह में
मेरा जो एतबार था वो मोतबर न था

उनसे तअल्लुक़ात यूँ क़ाइम न रख सका
बस इस लिये कि पास मिरे मालो-ज़र न था

आशिक़ तो और भी थे वहाँ पर बहुत मगर
मंसूर के अलावा कोई दार पर न था

उसकी ज़बां पे फ़ह्मो-फ़िरासत की बात थी
मुर्दादिलों पे उस का मगर कुछ असर न था

शहरे-बुताँ में बरसों हमारा रहा क़याम
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

ज़र्रानवाज़ी है ये‘मुबारक’’शफ़ीक़’ की
वरना हमारा शेर कभी नेट पर न था

मुबारक रिज़वी 08446789163

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6 comments on “T-17/15 माना ऐ दोस्त जज़बा-ए-दिल कारगर न था-मुबारक रिज़वी

  1. उसकी ज़बां पे फ़ह्मो-फ़िरासत की बात थी
    मुर्दादिलों पे उस का मगर कुछ असर न था

    शहरे-बुताँ में बरसों हमारा रहा क़याम
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

    achhi ghazal kahi hai Shafeeq Sahab……bahut-2 mubaarakbaad…

  2. शहरे-बुताँ में बरसों हमारा रहा क़याम
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    आ.रिज़वी साहब शानदार और लासानी गिरह |बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिलीमुबारकबाद कबूल फरमाएं
    सादर

  3. badhiya ghazal mubarak rizvi sahab….
    आशिक़ तो और भी थे वहाँ पर बहुत मगर
    मंसूर के अलावा कोई दार पर न था
    ye she’r to behad pasand aaya… girah par bhi daad qubulen…

  4. MUBAARAK SAHAB ACHHI GHAZAL KE LIYE MUBAARAKBAAD QABOOL KARE’N, MAYANK SAHAB NE SAHI FARMAAYA K
    खुश्बू मुक़य्यद नही होती !!! आप अपनी खुश्बू पर ऐसा इख़्तियार चाहे भी तो मुमकिन नहीं !! मुबारक साहब!!! –किसी न किसी हवाले से आप को हम तक आना था –मयंक…. AUR AAP AA HI GAYE. MUJHE JANAAB-E-KOUSAR NE ”LAFZ” TAK PAHUNCHAAYA WAISE BHI HAM AUR AAP WASEELE K QAAYIL HAI’N.

  5. माना ऐ दोस्त जज़बा-ए-दिल कारगर न था
    कुछ इख़तियार प्यार के इज़हार पर न था

    कुछ इख़तियार रहता तो मुआमला दिल का होता ही नहीं -मगरिब में लोगो को इस इज़हार की शायद तालीम दी जाती होगी-कैसे फूल देना है कैसे इज़हार करना है नतीज़ा ??!! जिस्मानी हलको तक महदूद रिश्ता जिसे प्यार नहीं कहा जा सकता — बेइख्तियारी सच्चे प्यार की सनद है –भले ही सहरा नवर्दी कदमो का मुकद्दर हो और तेशा सर की किस्मत !! खूब मतला कहा है !!!

    हाँ ना सही नहीं ही सही कुछ तो साथ हो
    इसरार मेरे इश्क़ का इक़रार पर न था
    रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ –इकरार ज़रूरी नहीं !!!

    क्या आइये कि किस लिये उसकी निगाह में
    मेरा जो एतबार था वो मोतबर न था
    जिस पर भरोसा नहीं उसे भरोसा दिलाना क्या !!! खूब !!!!!!!!!!!!!

    उनसे तअल्लुक़ात यूँ क़ाइम न रख सका
    बस इस लिये कि पास मिरे मालो-ज़र न था
    लेकिन उस राब्ते से ये तर्के ताल्लुक बेहतर है -जो मालोज़र के घूरे पर खड़ा था !!!

    आशिक़ तो और भी थे वहाँ पर बहुत मगर
    मंसूर के अलावा कोई दार पर न था
    अनल हक़ !!
    आना के दार पे खुलती है शाहराह कोई
    जिसे कि बस कोइ बेदार , देख पाता है

    उसकी ज़बां पे फ़ह्मो-फ़िरासत की बात थी
    मुर्दादिलों पे उस का मगर कुछ असर न था
    मुर्दादिल फहमें – नाकिस भी होते है -सिरिशतंन !!!

    शहरे-बुताँ में बरसों हमारा रहा क़याम
    ‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’
    अच्छी गिरह है !!!

    ज़र्रानवाज़ी है ये‘मुबारक’’शफ़ीक़’ की
    वरना हमारा शेर कभी नेट पर न था
    खुश्बू मुक़य्यद नही होती !!! आप अपनी खुश्बू पर ऐसा इख़्तियार चाहे भी तो मुमकिन नहीं -शफ़ीक़ साहब का कद मेरी नज़र में और बुलंद हो गया इस मक्ते को पढ़ कर !! मुबारक साहब!!! –किसी न किसी हवाले से आप को हम तक आना था – मुबारकबाद क़ुबूल करे –मयंक

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