11 टिप्पणियाँ

T-17/14 इस मरहले से कोई बशर बेख़बर न था-मुनव्वर अली ‘ताज’

इस मरहले से कोई बशर बेख़बर न था
इस जि़दंगी के बाद हमारा सफ़र न था

अपने सभी थे और पराया नगर न था
लेकिन किसी के पास सुकूं का शजर न था

अफ़सोस घर का बार उठाने के बाद भी
अपनों के दरमियान मैं बेहतर बशर न था

उल्फ़त के तार टूट के क्यों कर बिखर गये
क्या दिल न था दिमाग़ न था या जिगर न था .

दिल यूं न जान पाया हया के फ़रेब को
रौशन ज़मीर था न वो रौशन नज़र न था

जिसकी झलक सभी के लिये ख़ुशगवार थी
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

हम बस गये थे लफ़ज़ की बस्ती में इस लिये
अल्फ़ाज़ के जहान में मरने का डर न था

अहसास की थकान वो कैसे उतारता
इज़हार की तमीज़ सुख़न का हुनर न था

महशर के रोज़ सबको समझ में ये आयेगा
नेकी बदी का ‘ताज’ नतीजा सिफ़र न था

मुनव्वर अली ‘ताज’ 09893498854

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11 comments on “T-17/14 इस मरहले से कोई बशर बेख़बर न था-मुनव्वर अली ‘ताज’

  1. Munawwar Ali Taaz Sahab,

    Khoobsoorat Ghazal ke liye badhai aur shukriya.

  2. अहसास की थकान वो कैसे उतारता
    इज़हार की तमीज़ सुख़न का हुनर न था
    आ.ताज साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है |दिल की गहराइयों से दाद कबूल फरमाएं |
    सादर

  3. TAAJ SAHAB, UMDA GHAZAL HUI HAI, MAYANK SAHAB NE TO AAP KI GHAZAL PAR SAIR HAASIL GUFTAGU KI HAI MAI’N ISI PAR SWAAD KARTA HU’N, MUBAARAK HO.

  4. इस मरहले से कोई बशर बेख़बर न था
    इस जि़दंगी के बाद हमारा सफ़र न था

    ६०-७० बरस का वक्फ़ा !!इसके लिए इतनी मारामारी है — अलविदाह के बाद हम इस दुनिया के बाशिंदे नहीं रह जायेगे –सब जानते है –मगर यह बात याद ही नहीं रहती किसी को !!! मतले पर दाद !!

    अपने सभी थे और पराया नगर न था
    लेकिन किसी के पास सुकूं का शजर न था
    लोगो के पास बिस्तर है नींद नहीं — रिसाले हैं -इल्म नहीं -फ़िक्र है इज़हार नहीं !!! सुकूँ का शजर खुद अपने लिए नहीं !! तो हमारे आपके लिए किसी के पास क्या होगा !!!

    अफ़सोस घर का बार उठाने के बाद भी
    अपनों के दरमियान मैं बेहतर बशर न था

    इक वक्त था कि चैन का सामान घर में था
    बेटा था दस्तरस में बिरादर असर में था –अ क परवाज़ी
    फिर अगला मंज़र यही है कि उंगली पकड़ने वाला कालर पकड़ने लगा और आंगन में दीवार उठ गयी !!
    उम्र भर पेड़ लगाने का नतीज़ा रख दे
    ला मेरे हाथ पे सूखा हुआ पत्ता रख दे –परवाज़ी साहब

    उल्फ़त के तार टूट के क्यों कर बिखर गये
    क्या दिल न था दिमाग़ न था या जिगर न था .

    दिल था दिमाग़ था जिगर भी था लेकिन तार का दूसरा सिरा जिधर जुड़ता उधर भी कुछ होना चाहिए था .

    हम बस गये थे लफ़ज़ की बस्ती में इस लिये
    अल्फ़ाज़ के जहान में मरने का डर न था
    ताज साहब !!! बाकी मुहाज़ अलफ़ाज़ के जहांन से ज़ियादा कठिन है –शेर का तंज़ खूब उभारा है !!!

    अहसास की थकान वो कैसे उतारता
    इज़हार की तमीज़ सुख़न का हुनर न था

    ये थकान भीतर घर कर जाती है लिहाजा –सुखनगोई एक अच्छा रास्ता है जिस पर चल पाना कठिन है !!!

    महशर के रोज़ सबको समझ में ये आयेगा
    नेकी बदी का ‘ताज’ नतीजा सिफ़र न था

    क्या खूब क़यामत का है गोया कोइ दिन और ??!!! जो माहौल है चार सू वो भी महशर के नज़दीक ही है — लेकिन मैंने कभी कभी देखा है कि –किसी बेगुनाह के लिए जब सारे रास्ते बंद हो गए तब अजनबी सम्त् से फ़रिश्ते उसके लिए उतर आये और दुआये साफ बांध कर उसके हक़ में खड़ी हो गयी –अभी उसकी हल्की सी आहट फ़ज़ाओं में मिलती है –कुछ उम्र बाकी है शायद इस दुनिया की !!!!

    मुनव्वर अली ‘ताज’ साहब !! बहुत बहुत बधाई ग़ज़ल के लिये –मयंक

  5. ‘ताज’साहब

    हम बस गये थे लफ़्ज़ की बस्ती में इस लिये
    अल्फ़ाज़ के जहान में मरने का डर न था

    अहसास की थकान वो कैसे उतारता
    इज़हार की तमीज़ सुख़न का हुनर न था

    क्‍या अच्‍छे शै’र हैं! मरहबा!

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