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T-17/12 क्या ख़ूब लोग थे कि जिन्हें कुछ ख़तर न था-‘नूर’ जगदलपुरी

क्या ख़ूब लोग थे कि जिन्हें कुछ ख़तर न था
दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ था दुनिया का डर न था

उसकी अता तो आम थी सबके लिये मगर
करते भी क्या कि अपनी दुआ में असर न था

जंगल, पहाड़, नद्दियाँ, दुश्वार घाटियां
आसान इस क़दर भी हमारा न था

या तो मुक़ामे-शुक्र है शिकवे कि जा नहीं
साया तो था शजर में अगरचे समर न था

बंगले, सराय, महलो-मकानात थे मगर
लेकिन बड़े नगर में कोई एक घर न था

हक़ बात बोलने का था अंजाम सामने
यानी अब उस जवान के कांधों पे सर न था

दुनिया ने मेरे ऐब उछाले कुछ इस तरह
जैसे कि मुझमें इसके सिवा कुछ हुनर न था

बेशक तिरे जमाल में कोई कमी नहीं
सच है कि मेरे पास ही हुस्ने-नज़र न था

हालाँकि अपनी ज़ात में रहता था गुम मगर
हालाते-रोज़गार से वो बेख़बर न था

अशआर क्या थे लालो-गुहर थे मगर ऐ ‘नूर’
अफ़सोस बज़्म में कोई अहले-नज़र न था

‘नूर’ जगदलपुरी 09630858729

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8 comments on “T-17/12 क्या ख़ूब लोग थे कि जिन्हें कुछ ख़तर न था-‘नूर’ जगदलपुरी

  1. बहुत खूब नूर साहब

  2. Noor sahab,
    Khoobsoorat Ghazal ke liye haardik badhai.

  3. क्या ख़ूब लोग थे कि जिन्हें कुछ ख़तर न था
    दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ था दुनिया का डर न था

    उसकी अता तो आम थी सबके लिये मगर
    करते भी क्या कि अपनी दुआ में असर न था

    umda ghazal ke liye dili daad qubool farmaayen Noor Sahab…

  4. उसकी अता तो आम थी सबके लिये मगर
    करते भी क्या कि अपनी दुआ में असर न था
    आ.नूर साहब ,उस्तादाना ग़ज़ल के लिए तहेदिल से दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  5. क्या ख़ूब लोग थे कि जिन्हें कुछ ख़तर न था
    दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ था दुनिया का डर न था

    १४०० बरस पहले के मनाज़िर -हज़र त साहब , पैगम्बर अली , हज़रत हुसैन. और आगे जो भी सदाकत की रह पर चला —-तमाम तसावीर इस शेर में पोशीदा भी और नुमाया भी और शेर यकीनन क्या ख़ूब लोग थे—कह कर माज़ी के हवाले से मशवरा भी दे रहा है।

    उसकी अता तो आम थी सबके लिये मगर
    करते भी क्या कि अपनी दुआ में असर न था

    दुनिया बनाने वाले तूने कमी न की
    अब किस को क्या मिला ये मुकद्दर की बात है -दुआ हम तदबीर की इंतेहा बाद करते है –जो अगर क़ुबूल न हो तो भी इल्जाम खुद पर लिया गया है–शायर का जज़बा काबिले सताइश है और शेर भी

    जंगल, पहाड़, नद्दियाँ, दुश्वार घाटियां
    आसान इस क़दर भी हमारा सफ़र न था
    काफिया टाइपिंग में छूट गया है शायद यह काफिया सफ़र ही है –ऊला में लैंडस्केप मुश्किल मरहले पेश कर रहा है –जो ज़िंदगी की चुनौतियों के लिए बड़े अच्छे सिम्बल्स बने है

    या तो मुक़ामे-शुक्र है शिकवे कि जा नहीं
    साया तो था शजर में अगरचे समर न था
    नहीं बहार तो फ़िक्रे – बहार पैदा कर —–जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया — जो मूड है ग़ज़ल का उसको सपोर्ट देने में शेर सहीह जगह पर ग़ज़ल में आया है
    बंगले, सराय, महलो-मकानात थे मगर
    लेकिन बड़े नगर में कोई एक घर न था
    घर और मकानात के फर्क—एक शेर बशीर बद्र का
    घरो पे नाम थे नामो के साथ ओहदे थे
    बहुत तलाश किया कोइ आदमी न मिला ((::

    हक़ बात बोलने का था अंजाम सामने
    यानी अब उस जवान के कांधों पे सर न था
    हक़ बात बोलने का अंजाम कमोबेश हर दौर में यही होता है

    दुनिया ने मेरे ऐब उछाले कुछ इस तरह
    जैसे कि मुझमें इसके सिवा कुछ हुनर न था

    कुछ तो लोग कहें गए लोगों का काम है कहना

    बेशक तिरे जमाल में कोई कमी नहीं
    सच है कि मेरे पास ही हुस्ने-नज़र न था
    इस शेर को इसी ग़ज़ल के दू सरे शेर से जोड़ कर पढ़ते है और एक मुसलसल ग़ज़ल मिलती है

    हालाँकि अपनी ज़ात में रहता था गुम मगर
    हालाते-रोज़गार से वो बेख़बर न था
    और ये बेखुदी नही –ज़िंदगी ने खुद के बचाव के लिए ये लहजा –इधर अख्तियार कर लिया है !!!

    अशआर क्या थे लालो-गुहर थे मगर ऐ ‘नूर’
    अफ़सोस बज़्म में कोई अहले-नज़र न था

    ‘नूर’ जगदलपुरी साहब !!! अहले नज़र तो बहुत हैं लेकिन इधर उनको ख़ामुशी के फायदे नज़र आने लगे है –अच्छी ग़ज़ल पढ़ कर भी मुंह से वाह न निकालना –दाद न देना कोइ मामूली हुनर नहीं — हमारे दौर के अहले नज़र अपनी जुबान और जिस्म पर जो ज़बरदस्त इख्तियार रखते है –उसके लिए उनको दाद देनी चाहिए वगरना ऐसी ग़ज़ल पर ऐसी ख़ामुशी मेरी समझ के बाहर की बात है — बहरकैफ एक शेर आपके मक्ते के सपोर्ट में–
    उसे पहनो न पहनो वो सदा खुशरंग लगता है
    किसी सोने के ज़ेवर पे कभी क्या ज़ंग लगता है –मयंक

  6. khoobsurat ghazal ke liye mubarkbaad Noor Sahab!! ye sher khastaur par pasand aae..

    क्या ख़ूब लोग थे कि जिन्हें कुछ ख़तर न था
    दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ था दुनिया का डर न था

    उसकी अता तो आम थी सबके लिये मगर
    करते भी क्या कि अपनी दुआ में असर न था

    या तो मुक़ामे-शुक्र है शिकवे कि जा नहीं
    साया तो था शजर में अगरचे समर न था

    बंगले, सराय, महलो-मकानात थे मगर
    लेकिन बड़े नगर में कोई एक घर न था

    बेशक तिरे जमाल में कोई कमी नहीं
    सच है कि मेरे पास ही हुस्ने-नज़र न था

    अशआर क्या थे लालो-गुहर थे मगर ऐ ‘नूर’
    अफ़सोस बज़्म में कोई अहले-नज़र न था

    is sher main kafiya likhna bhool gae shayad, jo ‘Safar’ hona chahiye mere khyaal se..

    जंगल, पहाड़, नद्दियाँ, दुश्वार घाटियां
    आसान इस क़दर भी हमारा न था

    Asif ‘Amaan’

  7. umda ghazal huyi hai noor sahab mubaarakbaad qabool kare’n.

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