13 टिप्पणियाँ

T-17/11 ऐसा नहीं कि मुझ में कोई भी हुनर न था-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’

ऐसा नहीं कि मुझ में कोई भी हुनर न था
महफ़िल में ही कोई मगर अहले-नज़र न था

दिन की मिरी ख़ता से कोई बाख़बर न था
लेकिन दिली सुकून मुझे रात भर न था

ईसार का जो जज़बा इधर था उधर न था
कहने को दोस्त था वो हमारा, मगर न था

मैं अपनी बेघरी पे ज़रा भी नहीं उदास
मैं रह रहा था जिस में वो घर भी तो घर न था

दस्तार को बचाने की कोशिश में एक दिन
अंजाम ये हुवा मिरे कांधे पे सर न था

दोनों को वैसे दोनों की कोई ख़बर न थी
इक दूसरे से फिर भी कोई बेख़बर न था

ताउम्र ज़िन्दगी से नबर्दआज़मा रहे
लेकिन किसी महाज़ पे घुटनों में सर न था

बटवारा लाज़मी था मगर जान-बूझ कर
दीवार वो उठायी गयी जिस में दर न था

डॉ मुहम्मद ‘आज़म’ 09827531331

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13 comments on “T-17/11 ऐसा नहीं कि मुझ में कोई भी हुनर न था-डॉ मुहम्मद ‘आज़म’

  1. बहुत खूब आज़म साहब, अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए

  2. wahh wahh….AZAM SB….
    bahut khoobsoorat ghazal hui he
    matla yaksar talkh sach ko bayaan karta hua
    khaaskar facebook par tanz lajwaab hua he
    aakhiri sher to haasile ghazal hua he
    behtreen ghazal

  3. ताउम्र ज़िन्दगी से नबर्दआज़मा रहे
    लेकिन किसी महाज़ पे घुटनों में सर न था

    बटवारा लाज़मी था मगर जान-बूझ कर
    दीवार वो उठायी गयी जिस में दर न था

    poori ghazal behad umda hai…har sher laajawaab….bahut-2 mubaarakbaad Azam sahab….

  4. बटवारा लाज़मी था मगर जान-बूझ कर
    दीवार वो उठायी गयी जिस में दर न था
    आ. आज़म साहब उस्तादाना ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  5. Dr Azam sahab matla to Makta kamaal kiya hai aapne.. Murassa ghazal.. Dili mubarakbaad!!

  6. ऐसा नहीं कि मुझ में कोई भी हुनर न था
    महफ़िल में ही कोई मगर अहले-नज़र न था

    हर नज़र बस अपनी अपनी रोशनी तक जा सकी
    हर किसी ने अपने अपने ज़र्फ़ तक पाया मुझे –मैं शाइर का नाम भूल गया हूँ –लेकिन आज़म साहब !! आपका मतला इस पहले कहे गए शेर के इख्तियार से मुझे बाहर ज़रूर ले आया आपका मतला बहुत सादगी के साथ एक बहुत बड़ी बात कह रहा है –इतनी सादगी के साथ कि इसे शीशागरी के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता –अना की पैरवी के साथ उसे बुलंदी भी दे रहा है ये शेर !!! वाह !

    दिन की मिरी ख़ता से कोई बाख़बर न था
    लेकिन दिली सुकून मुझे रात भर न था

    पशेमाँ होना मेरी नज़र में जिगर वालो का बूता है और जिसने अश्क़े -निदामत से पानी बीनाई को धो लिया उसे आसमां से आगे यक़ीनन दिखाई देता है –इस शेर को दाद दाद दाद !!!

    ईसार का जो जज़बा इधर था उधर न था
    कहने को दोस्त था वो हमारा, मगर न था
    पुरखलूस दिखना — गरज़परस्तो की अदा में शुमार होता है — और हम इन्हे दोस्त समझ लेते है –दुनिया की असली सूरत तो खुद के अहसास के सिवा कोई नहीं दिखला सकता !! खूब शेर कहा है !!!बी

    मैं अपनी बेघरी पे ज़रा भी नहीं उदास
    मैं रह रहा था जिस में वो घर भी तो घर न था

    यानी —रहता था जिस मकान में वो भी तो घर न था……….. बहुत खूब डॉ साहब !!!!

    दस्तार को बचाने की कोशिश में एक दिन
    अंजाम ये हुवा मिरे कांधे पे सर न था

    मै इस शेर को पढ़ कर यूँ बेहद खुश हूँ कि डॉ आज़म साहब को नहीं मालूम कि उनका ख्याल मयंक अवस्थी के ख्याल से इत्तेफाकन टकरा गया है –अब हवाई जहाज साइकिल से तो टकराता नहीं –इसलिए मुझे अपने इस शेर पर फख्र महसूस हो रहा है —

    तिरी दस्तार युझको ढो रही है
    तेरे कांधो पे तेरा सर नहीं है –मयंक

    दोनों को वैसे दोनों की कोई ख़बर न थी
    इक दूसरे से फिर भी कोई बेख़बर न था

    एक मुश्किल रिश्ते को आसान अल्फाज़ में बांध दिया है !!!

    ताउम्र ज़िन्दगी से नबर्दआज़मा रहे
    लेकिन किसी महाज़ पे घुटनों में सर न था

    बुलंद शेर है और बुलंद आवाज़ है !!!

    बटवारा लाज़मी था मगर जान-बूझ कर
    दीवार वो उठायी गयी जिस में दर न था

    एक ६६६-६७ बरस का वक्त तैर रहा है इस शेर की आंखो में !!!

    डॉ मुहम्मद ‘आज़म’–साहब !! उस्तादाना ग़ज़ल और बेहद खूबसूरत अशआर के लिए आपका शुक्रिया !!! –मयंक

  7. waaaaah sir

    ईसार का जो जज़बा इधर था उधर न था
    कहने को दोस्त था वो हमारा, मगर न था

    दस्तार को बचाने की कोशिश में एक दिन
    अंजाम ये हुवा मिरे कांधे पे सर न था

    मैं अपनी बेघरी पे ज़रा भी नहीं उदास
    मैं रह रहा था जिस में वो घर भी तो घर न था

    बटवारा लाज़मी था मगर जान-बूझ कर
    दीवार वो उठायी गयी जिस में दर न था
    aap ka kya kehna
    matle se maqate tak ghazal samvaad karti nazar aa rahi hai
    dil se mubaraq ho sir , daad qubul farmaye ……Aapka Nazir

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