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T-17/8 मुझको कोई चराग जलाने का डर न था-राज मोहन चौहान

मुझको कोई चराग जलाने का डर न था
बीती रिवायतों का बना मेरा घर न था

वैसे वो अजनबी ही तो था मोतबर न था
पर और कोई शाम ढले राह पर न था

खुल के मिले हैं तर्के-तअल्लुक के बाद हम
तर्के-तअल्लुक़ात का कोई भी डर न था

उस के लिये महल भी थे क़िलए भी थे मगर
सुल्तान के नसीब में कोई भी घर न था

यूँ सर हिला रहा था मेरी बात-बात पर
ज़ाहिर था उस का ध्यान मेरी बात पर न था

राज मोहन चौहान 08085809050

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21 comments on “T-17/8 मुझको कोई चराग जलाने का डर न था-राज मोहन चौहान

  1. बहुत खूब राज साहब। दाद कुबूल कीजिए

  2. Khoobsoorat Ghazal ke liye Mubarakbad qubool farmayeN.

    • Dwijendra Dwij ji. aap ko dhanywad kahna utchit na hoga. main aap ka aabhari rahoonga. LAFZ ka aabhari rahooga.

  3. मुझको कोई चराग जलाने का डर न था
    बीती रिवायतों का बना मेरा घर न था

    bahut achha matla hai….umda ghazal ke liye mubaarakbaad Chauhan Sahab…

  4. उस के लिये महल भी थे क़िलए भी थे मगर
    सुल्तान के नसीब में कोई भी घर न था

    यूँ सर हिला रहा था मेरी बात-बात पर
    ज़ाहिर था उस का ध्यान मेरी बात पर न था
    आ.राजमोहन साहब अच्छी ग़ज़ल हुई है ,ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  5. अच्छी ग़ज़ल. आपके कलाम पर दिन ब दिन निखार आता जा रहा है. मुबारकबाद

  6. खुल के मिले हैं तर्के-तअल्लुक के बाद हम
    तर्के-तअल्लुक़ात का कोई भी डर न था

    यूँ सर हिला रहा था मेरी बात-बात पर
    ज़ाहिर था उस का ध्यान मेरी बात पर न था

    राजमोहन चौहान साहब,
    बहुत अच्‍छी रही ग़ज़ल और उसमें ये दो अश्‍आर बहुत पसंद आए। क्‍या बात….।
    शुक्रिया।
    सादर
    नवनीत

    • Navneet ji , sachmuch aashchary hota hai ki aap in sab gazalon ko padhate hain. Aur dhyan se padhate hain. Saubhagya hai mera. Aap ke dwara kahe gaye shabd mere liye amrit hain. dhanywad. sir

  7. खुल के मिले हैं तर्के-तअल्लुक के बाद हम
    तर्के-तअल्लुक़ात का कोई भी डर न था

    यूँ सर हिला रहा था मेरी बात-बात पर
    ज़ाहिर था उस का ध्यान मेरी बात पर न था

    kya acche she’r hue hain raaj mohan sahab,… waah waah.. daad qubulen

    • Swapnil “Aatish” ji bahut bahut dhanywad . mere liye aap logon ne jo hausala afzaai ke shabd kahe hain we mere liye bahut hi mahatwpoorn hain. dhanywad sir.

  8. मुझको कोई चराग जलाने का डर न था
    बीती रिवायतों का बना मेरा घर न था

    शेर तारीख के अदबी और सामाजिक लम्हों को समेट लाया है –वाह !!!

    खुल के मिले हैं तर्के-तअल्लुक के बाद हम
    तर्के-तअल्लुक़ात का कोई भी डर न था

    क्या शेर है क्या शेर है !! वाह !!

    उस के लिये महल भी थे क़िलए भी थे मगर
    सुल्तान के नसीब में कोई भी घर न था

    मकान और घर के शाइरी के पुराने ख्याल को एक नया ज़ाविया दिया है इस शेर ने सानी मिसरा काबिले गौर काबिले दाद है और तादेर याद रहने वाला है –बहुत खूब बहुत खूब !!

    यूँ सर हिला रहा था मेरी बात-बात पर
    ज़ाहिर था उस का ध्यान मेरी बात पर न था
    इस शेर पर भी दिल खोल कर तालियां और दाद !!!

    राज मोहन चौहान साहब !! एक शिकायत ये है कि आपने सिर्फ ५ शेर ही क्यों कहे –मयंक

    • मयंक जी क्या कहूँ , आप का ह्रदय बहुत ही बड़ा और साफ़ है। रेलवे की नौकरी में तमन्ना तो की लेकिन सीखना सम्भव नहीं हुआ। अब आप सब के बीच आ कर जो पढ़ रहा हूँ तो सचमुच उर्दू भाषा की सामर्थ और सूक्ष्म गहनता के दर्शन कर रहा हूँ। शब्द नहीं हैं कहने के लिए कि लफ्ज़ के इस पेज पर क्या पा रहा हूँ। आप को ह्रदय से धन्यवाद।

  9. यूँ सर हिला रहा था मेरी बात-बात पर
    ज़ाहिर था उस का ध्यान मेरी बात पर न था
    WAAH KYA KAHNE

    • शफीक जी हमारे “कौसर ” जी तो आप के fan हैं। मेरे पास आ कर बैठते ही आप की ग़ज़ल को सर्वप्रथम देखते हैं। और वे मेरे गुरुजनों में से हैं। तो सोचें कि यदि आप दो शब्द कहते हैं तो वे मेरे लिए क्या महत्व रखते हैं। ह्रदय से आप का आभार मानता हूँ।

  10. umda ashaar par mushtamil bahut achhchhi ghazal kahi hai jnb Raj Mohan chauhan ji..mubarakbaad …
    DR.AZAM

    • aap ka hriday se aabhaari hun. aap ne is gazal ko padha bhi, aur phir comment karne ka kasht bhi uthaya yehi to mere liye bahut hi badi baat hai. Dhanywad.

  11. Raj Mohan Chauhan Sahab, bahut achchi ghazal hui hai. aakhri sher to kalaam kaha hai.. Mubarak baad kubool kareiN..

    • aasif amaan ji bahut shukriya aap ka, aap ne mujhe jo diya hai wo aap nahi jante. kyonki main abhi KG ya Nursery ke balak jaisa hun. dhanyawad aap ko . abhari hun.

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