16 टिप्पणियाँ

T-17/7 जब शह्र में कोई भी मिरा अपना घर न था-दिनेश नायडू

जब शह्र में कोई भी मिरा अपना घर न था
हाँ था मगर मैं इतना कभी दर-ब-दर न था

लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था

यूँ तो हजारों लोग मिले मुझको राह में
उस हमसफ़र सा और कोई हमसफ़र न था

उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था

कोई भी नींद अपनी कभी खाब भर न थी
कोई भी खाब अपना कभी नींद भर न था

जो फ़ैसला नही लिया, वो ख्वाब था मेरा !
जो फ़ैसला हुआ है वो मद्दे-नज़र न था

मुझको किसी निगाह ने बख्शे हज़ार गुल
सहरा में वैसे हद्दे-नज़र तक शजर न था

दिल-दश्त में भटकते रहा मैं तमाम उम्र
उस दश्त में किसी भी शजर पे समर न था

बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

जब दिल किया तो मैने सफीने डुबो दिए
दरिया तो शांत था कहीं उसमें भंवर न था

दिनेश नायडू 09303985412

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16 comments on “T-17/7 जब शह्र में कोई भी मिरा अपना घर न था-दिनेश नायडू

  1. बहुत खूब दिनेश साहब, खूबसूरत ग़ज़ल हुई है। दिली दाद कुबूल कीजिए

  2. Kya umdaa ghazal hui hai bhaiya. ..

    लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
    लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था….behatreen

    उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
    सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था….zindabaad

    -Kanha

  3. दादा पूरी ग़ज़ल हमेशा की तरह उम्दा है। ढेरों दाद।

    यूँ तो हजारों लोग मिले मुझको राह में
    उस हमसफ़र सा और कोई हमसफ़र न था

  4. मुझको किसी निगाह ने बख्शे हज़ार गुल
    सहरा में वैसे हद्दे-नज़र तक शजर न था

    दिल-दश्त में भटकते रहा मैं तमाम उम्र
    उस दश्त में किसी भी शजर पे समर न था

    बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
    मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

    bahut achhi ghazal hai Dinesh Sahab……bahut-2 mubaarakbaad…

  5. लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
    लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था

    यूँ तो हजारों लोग मिले मुझको राह में
    उस हमसफ़र सा और कोई हमसफ़र न था

    उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
    सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था
    आ.दिनेश साहब ,हर एक शेर नायाब है | वा…….ह ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

  6. KOI BHI NEEND APNI KABHI KHWAB BHAR NA THI.
    KOI BHI KHWAB APNA KABHI NEEND BHAR NA THA.

    ACCHA SHER, BANDISH BHOT PYARI HAI. ( BADHAI)

  7. दिनेश भाई तमाम ग़ज़ल उम्दा है! भरपूर दाद!

  8. शहज़ादे ग़ज़ल की शायरी के लिये जिन-जिन चीज़ों की ज़ुरूरत होती है वो सब आपको मिल गये. दुआ दीजिये उसको जिसने ऐसी अच्छी ग़ज़ल कहने के लायक़ किया. टूटा दिल ज़िंदाबाद

  9. जो फ़ैसला नही लिया, वो ख्वाब था मेरा !
    जो फ़ैसला हुआ है वो मद्दे-नज़र न था

    बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
    मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

    दिनेश भाई,

    हमेशा की तरह बहुत अच्‍छी ग़ज़ल।
    ये दूसरा जो शे’र है, क्‍या मुझे मिल सकता है। काश मैं भी ऐसा लिख पाता।
    सादर
    नवनीत

  10. tamam ghazal umda hui hai dinesh…matla bahut umda hua hai..

    कोई भी नींद अपनी कभी खाब भर न थी
    कोई भी खाब अपना कभी नींद भर न था

    ye ‘bhar’ hazrte baani ke baaad tumhare yahaan dekh raha hun.. kya accha use kiya hai… sher ki bunawat ghazab hai…

    जो फ़ैसला नही लिया, वो ख्वाब था मेरा !
    जो फ़ैसला हुआ है वो मद्दे-नज़र न था
    is she’r ne bhi jaaan le li… ‘wo jo n aane wala hai naa usse humko maatlab hai’… :)..bahut umdaa ghazal hui hai….

  11. बहुत खूब दिनेश भाई …..बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है
    सचमुच कोई भी ख़ाब कभी नींद भर कहाँ होता है
    और ज़ब दिल किया तो मैंने सफ़ीने डुबो दिए वाले शेर ने तो दिल छू लिया..
    ..तमाम ग़ज़ल ही बेहद उम्दा है….हर शेर ही खूबसूरत है वाह वाह
    दिल दश्त में भटकते रहने वाले ही गजलों के इतने खूबसूरत फूल खिला सकते हैं

    दिली दाद क़ुबूल कीजिये
    अलोक

  12. जब शह्र में कोई भी मिरा अपना घर न था
    हाँ था मगर मैं इतना कभी दर-ब-दर न था

    जब आवारा थे तब भी इतने बेगाने नही थे ज़िंदगी से……. उस वक्त भी मैं ऐसा मगर दर बदर न था.…… वाह

    लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
    लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था

    एक फ़र्ज़ के तहत लड़ते रहे कोइ तवक्को नहीं थी। . वाह !!!

    कोई भी नींद अपनी कभी खाब भर न थी
    कोई भी खाब अपना कभी नींद भर न था

    शेर की गढ़न काबिले दाद है !!!

    मुझको किसी निगाह ने बख्शे हज़ार गुल
    सहरा में वैसे हद्दे-नज़र तक शजर न था

    मुझे पुरशिस्तगी को मिल गया कोइ हसीं वरना
    कभी मेरी मदद को आसमां से रब नही उतरा -क़तील

    बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
    मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

    वरना हम भी आदमी थे काम के ((::

    जब दिल किया तो मैने सफीने डुबो दिए
    दरिया तो शांत था कहीं उसमें भंवर न था

    दिनेश भाई !! दाद !! क़ुबूल कीजिये –मयंक

  13. लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
    लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था

    यूँ तो हजारों लोग मिले मुझको राह में
    उस हमसफ़र सा और कोई हमसफ़र न था

    उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
    सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था

    कोई भी नींद अपनी कभी खाब भर न थी
    कोई भी खाब अपना कभी नींद भर न था WAAH UMDA ASH’AAR HUYE HAI’N, NUBAARAK HO

  14. Dinesh Bhai.. achchi ghazal hui hai.. ye ash’aar bahut pasand aae..

    लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
    लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था

    उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
    सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था

    जो फ़ैसला नही लिया, वो ख्वाब था मेरा !
    जो फ़ैसला हुआ है वो मद्दे-नज़र न था

    मुझको किसी निगाह ने बख्शे हज़ार गुल
    सहरा में वैसे हद्दे-नज़र तक शजर न था

    बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
    मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

    behad mubarkbaad!!

  15. उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
    सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था

    बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
    मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

    बहुत खूब सर बधाई अच्छी ग़ज़ल के लिए

  16. ACHCHI GHAZAL …WAAH WAAAH..KHUSOOSAN YE SHER…”KOI BHI NEEnD…”
    MUBARAKBAAD NAIDU SB
    DR.AZAM

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