12 Comments

फिर यूँ हुआ ये काम ज़रूरी सा हो गया….सौरभ शेखर.

फिर यूँ हुआ ये काम ज़रूरी सा हो गया
जज़्बात पर लगाम ज़रूरी सा हो गया
हमसाये शर्मसार मिरी सादगी से थे
थोड़ा सा ताम-झाम ज़रूरी सा हो गया
परचम उठाये फिरता मैं बेसम्त कब तलक
इक ठौर, इक मुकाम ज़रूरी सा हो गया
कुछ रोज़ मैंने ग़म को मुसलसल किया ज़लील
फिर ग़म का एहतिराम ज़रूरी सा हो गया
शेरो-सुखन से दिल तो बड़ा शाद था मगर
फ़र्दा का इंतज़ाम ज़रूरी सा हो गया
जल्वों में कुछ कशिश न तमाशों में कोई बात
अब तो नया निज़ाम ज़रूरी सा हो गया
छलके कहीं न दर्द का पैमाना देखिये
‘सौरभ’ मियां कलाम ज़रूरी सा हो गया.
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12 comments on “फिर यूँ हुआ ये काम ज़रूरी सा हो गया….सौरभ शेखर.

  1. behad umdaa ghazal hui hai bhaiya…

    कुछ रोज़ मैंने ग़म को मुसलसल किया ज़लील
    फिर ग़म का एहतिराम ज़रूरी सा हो गया..kya jabardast she’r hai….

    maqta bhi behad umdaa…daad
    -kanha

  2. वाह दादा क्या ग़ज़ल हुई है….

    हमसाये शर्मसार मिरी सादगी से थे
    थोड़ा सा ताम-झाम ज़रूरी सा हो गया

    परचम उठाये फिरता मैं बेसम्त कब तलक
    इक ठौर, इक मुकाम ज़रूरी सा हो गया

    बहुत बहुत बधाई।

  3. Waah saurabh bhai kya khoob ashaar nikale hain ..gham ko zaleel phir gham ka ehtaraam kya kahne bhai bahut bahut mubarakbaad

  4. bahut umdah ghazal hui hai saurabh bhai…

    हमसाये शर्मसार मिरी सादगी से थे
    थोड़ा सा ताम-झाम ज़रूरी सा हो गया

    कुछ रोज़ मैंने ग़म को मुसलसल किया ज़लील
    फिर ग़म का एहतिराम ज़रूरी सा हो गया

    in dono ash’aar par dher saari daad….

  5. superb gazal. all she’rs out ofthe world. Dheron badhaiyan!

  6. हमसाये शर्मसार मिरी सादगी से थे
    थोड़ा सा ताम-झाम ज़रूरी सा हो गया
    बहुत खूब बहुत खूब !! while in Rome do as Romans do !!! और सच है सामाजिकता का एक ज़ाविया ये भी है कि जो ऐब हमसायों में हैं वो ऐब हमसाये आपमे भी देखना चाहते हैं !! मजबूत शेर !!

    परचम उठाये फिरता मैं बेसम्त कब तलक
    इक ठौर, इक मुकाम ज़रूरी सा हो गया
    निकल आये कहाँ मंज़िल की धुन में // यहाँ बस रास्ता ही रास्ता है !!! –निदा – खला का एक रूप है इस शेर में – और सौरभ आपने खूब कहा है !!! “”इक ठौर, इक मुकाम ज़रूरी सा हो गया””

    कुछ रोज़ मैंने ग़म को मुसलसल किया ज़लील
    फिर ग़म का एहतिराम ज़रूरी सा हो गया
    ये शेर भे कमाल का है !!! हक़ीकत है इसमे — पहले हिल मिल के ज़रा निस्बतें बढाता है
    फिर ये गम दिल का शहंशाह भी हो जाता है – मयंक
    गम को explore करने की ज़रूरत है !!! ये शाइराना फितरत वालों की ज़रूरत भी है और हर उस इंसान की नियति भी जो हस्सास तबीयत है !!! दिल गया रौनके हयात गई // गम गया सारी काइनात गई — जिगर

    शेरो-सुखन से दिल तो बड़ा शाद था मगर
    फ़र्दा का इंतज़ाम ज़रूरी सा हो गया
    तुमसे भी दिलफरेब हैं गम रोज़गार के !!!

    जल्वों में कुछ कशिश न तमाशों में कोई बात
    अब तो नया निज़ाम ज़रूरी सा हो गया
    अर्थ जो पंक्तियों में छिपा है वो ये कि –निज़ाम का काम ही तमाशेबाजी और जल्वे बिखेरना है !!!

    सौरभ भाई मतले के बारे में ये कहना है कि सानी मिसरे में कुछ अपूर्णता सी लग रही है –और मक़्ता “क़याम” पर भी बिल्कुल सहीह उतरता है – कलाम भी तस्लीम !!. गज़ल पर पूरी दाद !!! –मयंक

    • सर आप ग़ज़ल की रूह तक पहुँचते हैं.और आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों के लिए शुक्रिया एक अदना लफ्ज़ है. हाँ,मतले के सानी मिसरे में थोड़ी सी छूट ली गई है.पूरा मिसरा ‘जज़्बात पर लगाम लगाना ज़रूरी सा हो गया’ होता,लेकिन मेरी सोच थी कि ‘जज़्बात पर लगाम’ से भी अर्थ प्रेषित हो रहा है.

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