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T-16/12 तुम्हारी बज़्म में सच के लबों पे ताला है-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

तुम्हारी बज़्म में सच के लबों पे ताला है
और उस पे दावा कि इंसाफ़ मिलने वाला है

बड़े ही नाज़ से इस दिल को हमने पाला है
इसे संभाल के रखना ये भोला-भाला है

वो जिसकी ज़ात से मंसूब हैं मिरी ग़ज़लें
वो अपने हुस्न में इक शोला-ए-जव्वाला है

न हमको देख हिक़ारत से जाने-महबूबी
हमारे दम से तिरी बज़्म में उजाला है

तुम अपने आपको हमसे छुपाओगे कैसे
तुम्हारे गिर्द तो इक रौशनी का हाला है

अभी तो ज़द में कई रिंद और आयेंगे
अभी तो साक़ी ने सागर युंही उछाला है

किसी के काम कब आया ज़रा बता तो सही
ज़माने हमने तुझे खूब देखा-भाला है

निगल रहा है अँधेरा कई मकानों को
ये और बात तिरे शहर में उजाला है

सियाहबख्ती तो हद से गुज़र गयी अपनी
कि रात वैसे भी काली थी दिन भी काला है

ये और बात कि तुम इक शरीफ़ज़ादे हो
तुम्हारा लहजा मगर दिल दुखाने वाला है

ख़ुदा ही जाने है तेरे बतन में क्या-क्या कुछ
नयी सदी तिरा अंदाज़ ही निराला है

खुद अपनी चश्मे-बसीरत से फ़ैसला कर ले
‘अँधेरा है कि तिरे शहर में उजाला है’

ये गम की रात तो मेहमान है कुछ इक पल की
‘सलाम सब्र तो कर दिन निकलने वाला है

अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ 09300212960

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5 comments on “T-16/12 तुम्हारी बज़्म में सच के लबों पे ताला है-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

  1. बहुत खूब कौसर साहब, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है। दिली दाद कुबूल कीजिए

  2. अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ साहब !! बहुत खूब !! एक मुशायरा जगा दिया इस गज़ल ने मेरे भीतर !! एक से एक बढकर लाजवाब शेर कहे हैं आपने – जो अगले वक़्त के बयान याद आये उन्हें क्वोट कर रहा हूँ –
    तुम्हारी बज़्म में सच के लबों पे ताला है
    और उस पे दावा कि इंसाफ़ मिलने वाला है
    खूबसूरत और मुकम्मल मतला !!! चार पंक्तियाँ
    यहाँ होठों पे बन्दिश है यहाँ आँखों पे पहरा है
    यहाँ इंसाफ गूँगा है यहाँ सुल्तान बहरा है
    दिलों पर बर्फ़ की चादर है जागो अब मेरे सूरज
    यहाँ तो एक ही मौसम बड़ी मुद्दत से ठहरा है ( कश्मीर – 2011)
    वो जिसकी ज़ात से मंसूब हैं मिरी ग़ज़लें
    वो अपने हुस्न में इक शोला-ए-जव्वाला है
    यक़ीनन !! हर पैकर उसी का है और उसी के करम से सभी में नूर झलकता है शम्मे हरम हो या हो दिया सोमनाथ का !!! और ज़मीनी किरदारों से हम इस ज़ाँविदा किरदार का शाइरी में भी इज़हार करते है
    ये इल्म के शिकवे ये रिसाले ये किताबे
    इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिये हैं ( जाँ निसार अख़्तर)
    न हमको देख हिक़ारत से जाने-महबूबी
    हमारे दम से तिरी बज़्म में उजाला है
    नाज़ कर खुद पर कि तू है बेशुमार
    कद्र कर मेरी कि मैं बस एक हूँ
    तुम अपने आपको हमसे छुपाओगे कैसे
    तुम्हारे गिर्द तो इक रौशनी का हाला है
    इस शेर का दूसरा पहलू —
    वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
    रहता है अपने नूर में सूरज छुपा हुआ ( शिकेब)
    अभी तो ज़द में कई रिंद और आयेंगे
    अभी तो साक़ी ने सागर युंही उछाला है
    सब एक ख्वाब है बेदारे चश्मे साक़ी का
    कोई न जान सका रूशनास महफिल में
    किसी के काम कब आया ज़रा बता तो सही
    ज़माने हमने तुझे खूब देखा-भाला है
    इल्म की बात है और ये दुनिया गर मिल भी जाये तो क्या है ?!!!
    निगल रहा है अँधेरा कई मकानों को
    ये और बात तिरे शहर में उजाला है
    ये अलमीया है हमारे दौर का – इसे हर वर्ग ने महसूस किया है — islands of prosperity in an ocean of poverty जैसी पंक्तियाँ इसी बर्बर सचाई की देन हैं —
    वो देख चाँद की पुरनूर कहकशाओं में
    तमाम रंग है खुर्शीद के पसीने का
    सियाहबख्ती तो हद से गुज़र गयी अपनी
    कि रात वैसे भी काली थी दिन भी काला है
    खूब शेर कहा है खूब !!!! ऊला सानी दोनो का जवाब नहीं दोनो मिसरे अकेले भी मुकम्मल हैं !!
    ये और बात कि तुम इक शरीफ़ज़ादे हो
    तुम्हारा लहजा मगर दिल दुखाने वाला है
    तुम्हारी बात बिल्कुल ठीक ही थी
    मगर लहजा बदलना चाहिये था ( तुफैल साहब )
    ख़ुदा ही जाने है तेरे मतन में क्या-क्या कुछ
    नयी सदी तिरा अंदाज़ ही निराला है
    खूब्सूरत उदास खौफज़दा
    वो है इक्कीसवीं सदी की तरह ( बशीर)
    खुद अपनी चश्मे-बसीरत से फ़ैसला कर ले
    ‘अँधेरा है कि तिरे शहर में उजाला है’
    अच्छी गिरह लगाई ज़ाविया बिल्कुल अलग है !!
    ये गम की रात तो मेहमान है कुछ इक पल की
    ‘सलाम सब्र तो कर दिन निकलने वाला है
    यानी रात बहुत जागे थे सुभ हुई आराम किया –मीर साहब !!!
    क़ौसर साहब !!! इस मोतियों की माला के लिये बहुत बहुत ब्धाई आपको –मयंक

  3. ये और बात कि तुम इक शरीफ़ज़ादे हो
    तुम्हारा लहजा मगर दिल दुखाने वाला है

    लाजवाब मतला और बेहतरीन कहे हैं आदरणीय कौसर जी !
    दाद क़ुबूल कीजिये !!

  4. वो जिसकी ज़ात से मंसूब हैं मिरी ग़ज़लें
    वो अपने हुस्न में इक शोला-ए-जव्वाला है

    न हमको देख हिक़ारत से जाने-महबूबी
    हमारे दम से तिरी बज़्म में उजाला है
    आ. कौसर सा.
    इस मुक़म्मल और उस्तादाना ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल फरमाएं
    सादर

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