10 टिप्पणियाँ

T-16/8 तिरी अना ने सलीक़े से जो निकाला है-नवनीत शर्मा

तिरी अना ने सलीक़े से जो निकाला है
वो मेरे रुख़ पे मिरे दर्द का रिसाला है

कहूं या छोड़ूं ज़बां पर जो आने वाला है
जी.. वो.. मैं.. हां..क‍ि ये मौसम बदलने वाला है

वो इक चराग़ जिसे ख़ून देके पाला है
सितम ये क्‍या कि हवा का वही निवाला है

तिरी तलाश में दिन-भर भटक के लौट आया
हुई है शाम तो खुद में उतरने वाला है

तुम्‍हारे जि़क्र की माचिस किसी ने दिखला दी
लो फिर से याद का जंगल सुलगने वाला है

तिरी तलाश में शोलों पे दौड़े हैं दिन-रात
ये मेरे पांव जिन्‍हें चांदनी ने पाला है

तिरे ख़याल से फुरसत मिले तो ग़ौर करूं
‘अंधेरा है कि तिरे शहर में उजाला है’

जहां से ख़ाब के पंछी उड़ान भरते थे
उसी शजर को हक़ीक़त ने काट डाला है

बहुत अज़ीज़ मुझे है मगर ये छूटेगा
मिरा ये जिस्‍म मिरी रूह का दुशाला है

हटो यहां से कि मलबे में दब न जाओ कहीं
खंडर ये दिल का ज़मींदोज़ होने वाला है

ये क्‍यों कहा कि तुझे रोज़ याद आऊंगा
कहीं ये सच तो नहीं तू बिछड़ने वाला है

बताते रहते हो खिड़की का जिसको तुम परदा
तुम्‍हारी दीद पे क़ाबिज़ मियां वो जाला है

बगैर ‘शिव’ के है आबाद शह्र लोहे का
बग़ैर शिव के कहां शह्र ये बटाला है *

मिलेगा तर्के-तअल्‍लुक़ से क्‍या उसे ‘नवनीत’
जो मुझपे बीता है उस पर गुज़रने वाला है

(विरह को सुल्‍तान मानने वाले दिवंगत पंजाबी शायर शिव बटालवी के लिए )

नवनीत शर्मा 09418040160

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10 comments on “T-16/8 तिरी अना ने सलीक़े से जो निकाला है-नवनीत शर्मा

  1. तुम्‍हारे जि़क्र की माचिस किसी ने दिखला दी
    लो फिर से याद का जंगल सुलगने वाला है

    हटो यहां से कि मलबे में दब न जाओ कहीं
    खंडर ये दिल का ज़मींदोज़ होने वाला

    वाह वाह नवनीत दादा। बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है। शिल्प की सलाहियत और आपकी ग़ज़लों में भरा पूरा आसमान सबका मन मोह लेता है। बहुत बधाई।

  2. बहुत खूब नवनीत जी। बहुत खूब। शानदर अश’आर हुए हैं। इस मुकम्मल ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कुबूल कीजिए।

  3. नवनीत भाई !!!शेर सभी पसन्द आये लेकिन कुछ जो बहुत पसन्द आये क्वोट कर रहा हूँ —
    वो इक चराग़ जिसे ख़ून देके पाला है
    सितम ये क्याज कि हवा का वही निवाला है
    मुझे संतान, रिश्ते , उमीद और आत्मीयता के सम्बल के सन्दर्भ में ये शेर बहुत प्रासंगिक लगा क्योंकि इनके खोने का भय अंतस में कहीं न कही व्याप्त रहता है ।
    तुम्हाेरे जि़क्र की माचिस किसी ने दिखला दी
    लो फिर से याद का जंगल सुलगने वाला है
    यह शेर इसलिये कि –ऐसा ख्याल मुझे भी अ चुका है — हवाओं में जो चिंगारी थी अब तक
    वो अब जंगल के दिल में जा पड़ी है
    तिरी तलाश में शोलों पे दौड़े हैं दिन-रात
    ये मेरे पांव जिन्हें चांदनी ने पाला है
    तशबीह मोह रही है !!!
    जहां से ख़ाब के पंछी उड़ान भरते थे
    उसी शजर को हक़ीक़त ने काट डाला है
    वो शाख ही न रही जो थी आशियाँ के लिये जैसी बात !!!!
    मिलेगा तर्के-तअल्लुलक़ से क्याक उसे ‘नवनीत’
    जो मुझपे बीता है उस पर गुज़रने वाला है
    हासिले गज़ल !!! बहुत बहुत बधाई !!! शानदार और जानदार ग़ज़ल —मयंक

  4. खुर्शीद भाई साहब,
    महब्‍बतों के लिए शुक्रगुज़ार हूं। आप हमेशा तारीफ़ करते हैं जो ज़ाहिर है मुझ जैसे आदमी को बहुत पसंद आती है।
    शुक्रिया।
    नवनीत

  5. नवनीत भाई बहुत ख़ूब! तमाम ग़ज़ल अच्छी है! दिली दाद!

  6. Main aap sab ka mashkoor hoon. Swapnil bhai…kaash main Noida aa paata. Kal detailed shukriya adaa karoonga.
    Regards.
    Navneet Sharma

  7. Kya kamal ki ghazal hui hai bhaiya. ..Damdaar. .aur shandaar

    तुम्हारे जि़क्र की माचिस किसी ने दिखला दी
    लो फिर से याद का जंगल सुलगने वाला है

    ahaa. ..dhero’n daad 🙂
    -Kanha

  8. navneet bhai poori ghazal umdah hui hai,, aaj ki mehfil me aapka intezar raha..baad me dekha to aap ka pata nahi chala…

    तुम्‍हारे जि़क्र की माचिस किसी ने दिखला दी
    लो फिर से याद का जंगल सुलगने वाला है

    हटो यहां से कि मलबे में दब न जाओ कहीं
    खंडर ये दिल का ज़मींदोज़ होने वाला है

    बताते रहते हो खिड़की का जिसको तुम परदा
    तुम्‍हारी दीद पे क़ाबिज़ मियां वो जाला है
    bahut hi umdah she’r hue hain ye..in par bataure khaas daad qubule keejiye…

  9. Dear Navneet ji, aapki ghazal ka intezaar rehta hai, aap ki talaash mafhoom ko lekar kafi inspire karti hai, Ghazal behad khoob kahi hai khas tuar par yeh sher bahut hi achcha laga “ये क्‍यों कहा कि तुझे रोज़ याद आऊंगा
    कहीं ये सच तो नहीं तू बिछड़ने वाला है” Behad mubarak baad!!

  10. ये क्‍यों कहा कि तुझे रोज़ याद आऊंगा
    कहीं ये सच तो नहीं तू बिछड़ने वाला है

    बताते रहते हो खिड़की का जिसको तुम परदा
    तुम्‍हारी दीद पे क़ाबिज़ मियां वो जाला है
    आ.नवनीत भाई सा.
    बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मिसरा दर मिसरा तसव्वुर के तिलस्म के नये नये दर खुलकर अहसासों के नये नये करिश्मे दिखा रहें हैं |ढेरों दाद वाह………..
    सादर

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