9 टिप्पणियाँ

T-16/6 कहीं सफ़ेद कहीं रंग इसका काला है-अहमद सोज़

कहीं सफ़ेद कहीं रंग इसका काला है
अँधेरा है कि तिरे शहर में उजाला है

अभी तलक तो है इंसानियत हमारे बीच
अभी तलक तो मुहब्बत का बोल-बाला है

वो जिसको पाँव की जूती समझ रहे थे सब
कभी वो लक्ष्मीबाई कभी मलाला है

ख़ला में शोर जमा कर रहा है दीवाना
अभी तलक ये जो इंसाँ है भोला-भाला है

ज़मीं गुनाहों के लावे से पक रही है अभी
ये सारा सब जो है धरती का इक निवाला है

लगाऊं सेंध किसी तरह उसके दिल तक मैं
ख़ज़ाना हुस्न का उसके चुराने वाला है

मिरा तो “सोज़” ही ईमान है मुहब्बत पर
मिरे लिये यही मस्जिद यही शिवाला है

अहमद सोज़ 09867220699

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9 comments on “T-16/6 कहीं सफ़ेद कहीं रंग इसका काला है-अहमद सोज़

  1. अच्छी ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद सोज़ साहब।

  2. खूबसूरत अश’आर हुए हैं सोज़ साहब। दाद कुबूल करें।

  3. अभी तलक तो है इंसानियत हमारे बीच
    अभी तलक तो मुहब्बत का बोल-बाला है
    आ.सोज़ सा. खुबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल फरमाएं |आपकी आला सोच के साये में इंसानियत और मुहब्बत का हमेशा बोलबाला रहेगा |आमीन |
    सादर

  4. कहीं सफ़ेद कहीं रंग इसका काला है
    अँधेरा है कि तिरे शहर में उजाला है

    अभी तलक तो है इंसानियत हमारे बीच
    अभी तलक तो मुहब्बत का बोल-बाला है

    वो जिसको पाँव की जूती समझ रहे थे सब
    कभी वो लक्ष्मीबाई कभी मलाला है

    बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है सोज़ साहब।मक़ता तो कमाल का हुआ है। ढेरों दाद।

  5. ख़ला में शोर जमा कर रहा है दीवाना

    भाई किस क़दर उम्दा बल्कि बड़ा मिसरा है. वाह,वाह

  6. ख़ला में शोर जमा कर रहा है दीवाना
    अभी तलक ये जो इंसाँ है भोला-भाला ह
    wahh…..bahut khoob
    -Kanha

  7. matla aur maqta lajawab hai dad qubul karen

  8. कहीं सफ़ेद कहीं रंग इसका काला है
    अँधेरा है कि तिरे शहर में उजाला है
    बहुत कामयाब मतला – सफेद और काला रंग दोनो लफ़्ज़ बोल रहे हैं
    ज़मीं गुनाहों के लावे से पक रही है अभी
    ये सारा सब जो है धरती का इक निवाला है
    सच है जब भी ये ज़मीन बैचैन हो कर करवट लेगी – सब कुछ समाप्त हो जायेगा –लेकिन किसी को ये फिक्र नहीं है
    लगाऊं सेंध किसी तरह उसके दिल तक मैं
    ख़ज़ाना हुस्न का उसके चुराने वाला है
    वाह !!!
    सोज़ साहब की हर गज़ल की तरह ये ग़ज़ल भी मजबूत और पुर असर है बधाई –मयंक

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