9 टिप्पणियाँ

उदासी से सजे रहिये-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

उदासी से सजे रहिये
कोई रुत हो हरे रहिये

सभी के सामने रहिये
मगर जैसे छिपे रहिये

जो डूबी है सराबों में
वो कश्ती ढूंढते रहिये

वो पहलू जैसे साहिल है
तो साहिल से लगे रहिये

पड़े रहना भी अच्छा है
मुहब्बत में पड़े रहिये

भंवर कितने भी प्यारे हों
किनारे पर टिके रहिये

समय है गश्त पर हर पल
जहां भी हों छिपे रहिये

ख़ुदा गुज़रे न जाने कब
ख़ला में देखते रहिये

रज़ाई खींचिए सर तक
सहर को टालते रहिये

न जाने कब सहर हो जाय
मुसलसल जागते रहिये

न कट जाये पतंगों सा
फ़लक को देखते रहिये

वो ऐसे होंट हैं के बस
हमेशा चूमते रहिये

यही करता है जी ‘आतिश’
कि अब तो बस बुझे रहिये

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश 08879464730

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9 comments on “उदासी से सजे रहिये-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. उदासी से सजे रहिये
    कोई रुत हो हरे रहिये

    सभी के सामने रहिये
    मगर जैसे छिपे रहिये

    न जाने कब सहर हो जाय
    मुसलसल जागते रहिये

    यही करता है जी ‘आतिश’
    कि अब तो बस बुझे रहिये
    wahwah aatish ji chhoti bahr ki bahuut achhi lgi

  2. Dada itni chhoti bahar me aise khayalat ke sath gazal kehna abhut mushkil hota hai…aur aap itni aasani me har ek she’r ko dil me utrne ka hunar baksh dete hain ki kya kehne….Maqte ke sath apke jaisa nyaay krte hue maine kisi ko bhi nhi dekha hai…main bahut khushnaseeb hu’n jo apka shagird banne ka soubhagya mila mjuhe…sadar pranam.
    -kanha

  3. chhoti si bahar me kya kuchh nahi kaha ,ak aur khoobsoorat gazal
    aapki gazlen khoob bhati hai ,jis tarah symbols me aap tamaam ankahi baaton ko abhivyakt karte huye bhi ak chuppi banaaye rakhte hai …khoob raas aata hai .!
    is khoobsoorat si gazal ke liye swapnil bhaiya aapko dheron daad.

  4. Itni choti beher me itne achhe achhe sher aur aise metaphors… Hairaan hun :O

    जो डूबी है सराबों में
    वो कश्ती ढूंढते रहिये

    पड़े रहना भी अच्छा है
    मुहब्बत में पड़े रहिये

    ख़ुदा गुज़रे न जाने कब
    ख़ला में देखते रहिये

    न जाने कब सहर हो जाय
    मुसलसल जागते रहिये

    Aur khaas taur pe ye sher :

    वो ऐसे होंट हैं के बस
    हमेशा चूमते रहिये

    Zindabaad Swapnil Bhai… Zindabaad 🙂

  5. गागर में सागर भरा है आपने इस ग़ज़ल में. ख़ूब मानिखेज़ शेर हुए हैं!
    जो डूबी है सराबों में
    वो कश्ती ढूंढते रहिये….क्या कहने!

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