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T-15/15 ग़ज़ल सुनाऊँ मैं ऐसे में आशिक़ाना क्या-मुबारक रिज़वी

ग़ज़ल सुनाऊँ मैं ऐसे में आशिक़ाना क्या
शरीके -बज़मे-सुख़न है मिरा ज़माना क्या

निगाहे-आम ने वो हादिसात देखे हैं
तिरी ज़बां से सुनेगा कोई फ़साना क्या

ख़बर तो लेती है अपने पड़ोस की दुनिया
मगर पता नहीं होता दुरूने-ख़ाना क्या

तेरे इशारे पे मरते हैं लोग सौ-सौ जान
तिरी निगाह है इस दर्जा क़ातिलाना क्या

अटल है वक़ते-अजल आयेगा तो आयेगा
चला है मौत के आगे कोई बहाना क्या

अमीरे-वक़्त ने सौ झोपड़े जलाये हैं
किसी ग़रीब ने फूँका है आशियाना क्या

ये कैसा जुर्म है कैसी सज़ा है ये तेरी
अरे, है इश्क़ ’मुबारक’ का मुजरिमाना क्या

मुबारक रिज़वी 08809958191

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11 comments on “T-15/15 ग़ज़ल सुनाऊँ मैं ऐसे में आशिक़ाना क्या-मुबारक रिज़वी

  1. MATLE SE MAQTE TAK POORI GHAZAL UMDA HAI, MARHABA SAD MARHABA

  2. Misra e tarah jin qawaafi ko chaahta hai…
    un qawaafi ka hi istemaal..
    Tahzeeb e tarhi ghazal hai..
    Bepanaah khushi huyi…
    aap ki ghazal paDh kar..
    Aap ne is ka paas rakha hai..
    Ash’aar bhi bahad umdaa
    Ghazal shaandaar huyi hai..
    mubaarakbaad..
    Dr Azam

  3. bahut acchi ghazal hui hai rizvi sahab… ghazal ashiqana bhi hai..saath hi isme hamaara samay bhi jhalak raha hai… waah

  4. उम्दा ग़ज़ल जनाब! दाद हाज़िर है!

  5. निगाहेआम ज़बान का बढ़िया शेर है भाई। ग़ज़ल में वक़्तेअजल के साथ अटल का प्रयोग अनुप्रास का बहुत अच्छा दृश्य उपस्थित कर रहा है। सच कहा बेचारा ग़रीब क्या किसी का आशियाना फूँकेगा। बढ़िया ग़ज़ल, बधाई भाई। जीते रहिये।

  6. रिज़वी साहब, ग़ज़ल आपकी रज़ा में राज़ी है. आपका कलम बहुत अच्छा है. मेरी दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  7. aadarniya Rizvi sahab ,pranam.
    ak behad achhi gazal ke liye dheron daad

    निगाहे-आम ने वो हादिसात देखे हैं
    तिरी ज़बां से सुनेगा कोई फ़साना क्या

    ख़बर तो लेती है अपने पड़ोस की दुनिया
    मगर पता नहीं होता दुरूने-ख़ाना क्या

    wah wah

  8. आदरणीय रिज़वी साहब….
    बहुत बधाई अच्‍छे अशआर के लिए।
    शुक्रिया।
    नवनीत

  9. निगाहे-आम ने वो हादिसात देखे हैं
    तिरी ज़बां से सुनेगा कोई फ़साना क्या

    ख़बर तो लेती है अपने पड़ोस की दुनिया
    मगर पता नहीं होता दुरूने-ख़ाना क्या
    आ.रिज़वी सा. बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है
    ढेरों दाद कबूल फरमाए
    आदाब

  10. मुबारक साहब,
    बहुत बढिया गज़ल हुई है..

    ये शेर तो कमाल के हैं:
    निगाहे-आम ने वो हादिसात देखे हैं
    तिरी ज़बां से सुनेगा कोई फ़साना क्या

    ख़बर तो लेती है अपने पड़ोस की दुनिया
    मगर पता नहीं होता दुरूने-ख़ाना क्या

    अटल है वक़ते-अजल आयेगा तो आयेगा
    चला है मौत के आगे कोई बहाना क्या

    अमीरे-वक़्त ने सौ झोपड़े जलाये हैं
    किसी ग़रीब ने फूँका है आशियाना क्या

    वाह.

  11. निगाहे-आम ने वो हादिसात देखे हैं
    तिरी ज़बां से सुनेगा कोई फ़साना क्या
    कहना चाहूंगा – गर सुन भी लिया तेरा फ़साना,कोई भला यकीं करेगा क्या.
    खूबसूरत कलाम रिजवीजी.

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