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T-13/16 जी भर रोकर जी हल्का हो जाता है-अनिल जलालपुरी

जी भर रोकर जी हल्का हो जाता है
वरना तन-मन जलथल सा हो जाता है

हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है

बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है

जाहिल जब बैठेंगे आलिम के दर पे
हश्र यक़ीनन ही बरपा हो जाता है

उल्फ़त का सागर हूँ, नफ़रत का दरिया
मिलकर मुझसे मुझ जैसा हो जाता है

‘पल्टू साहब’ की बानी है भूखों को
भोजन दो तो पूजा सा हो जाता है

रफ़्ता रफ़्ता सब उम्मीदें मरती हैं
‘धीरे धीरे सब सहरा हो जाता हैं’

(पल्टू साहब-जलालपुर के प्रसिद्ध संत)

अनिल जलालपुरी 09161755586

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28 comments on “T-13/16 जी भर रोकर जी हल्का हो जाता है-अनिल जलालपुरी

  1. अनिल भाई
    तरही दर तरही आपसे मुहब्बत बढ़ती जा रही है ….

    हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है
    क्या बढ़िया शेर गढ़ा है !!!

    बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है
    आज के दौर का सच !!!

  2. हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है

    बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है…ye donon sher behad pasand aae

  3. सारी ग़ज़ल ही बढ़िया है। वाह-वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये।

  4. बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है

    tamaam gazal hi umda hai ,daad kubul karen anil jalaalpuri jii

  5. हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है

    बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है

    अनिल भाई, बहुत अच्‍छी ग़ज़ल लेकिन ये दो शे’र कम्‍म्‍माल के लगे मुझे…।
    बहुत बधाई।
    नवनीत

  6. जी भर रोकर जी हल्का हो जाता है
    वरना तन-मन जलथल सा हो जाता है
    आज जी भर के जो रोये हैं तो यूँ खुश हैं फराज़
    चन्द लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे –अहमद फराज़
    हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है
    जय जयप्रकाश , जय हजारे !!
    बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है
    जय महाराष्ट्र !!अमार सोनार बांग्लाय !! तमिल ईलम!!? आपणिया—लेकिन हिन्दुस्तान कहाँ है!!?? सिर्फ उतनी ज़मीन पर जितने पर हम आप खड़े हैं
    जाहिल जब बैठेंगे आलिम के दर पे
    हश्र यक़ीनन ही बरपा हो जाता है
    तब कामंन्वेल्थ , कोलगेट , टू जी -3 जी और जीजा जी सब सामने आयेंगे –हश्र बरपा होगा ज़रूर !!
    उल्फ़त का सागर हूँ, नफ़रत का दरिया
    मिलकर मुझसे मुझ जैसा हो जाता है
    ये यथा माँ प्रपद्यंते –ताँ तथैसभ्जाम्यहम !! ( जो मुझे जैसे पूजते हैं मैं भी उन्हें वैसे ही भजता हूँ –गीता )
    ‘पल्टू साहब’ की बानी है भूखों को
    भोजन दो तो पूजा सा हो जाता है
    सुन्दर शेर है – फकीर को नमन !!
    रफ़्ता रफ़्ता सब उम्मीदें मरती हैं
    ‘धीरे धीरे सब सहरा हो जाता हैं’
    अच्छी गिरह लगाई है अनिल साहब !!
    गज़ल पर बधाई !!-मयंक

    • मयंक साहब
      बहुत बहुत शुक्रिया ग़ज़ल को ग़ज़ल बनाने के लिये
      ग़ज़ल की वैल्यू बढ़ा दी आपने
      बहुत बहुत धन्यवाद

  7. हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है

    बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है waah waah anil sahab kya kahne …

  8. बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है
    बहुत करीबेहकीकत शेर है अनिल सा. तमाम ग़ज़ल उम्दा हुई है ढेरों दाद कबूल फरमाएं

    • हौसलाअफ़जाई के लिये बहुत बहुत शुक्रिया
      करम बनाये रखियेगा

  9. Bahut Badhia gazal hui hai Anil ji… aur ye sher to kya kehne :

    हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है

    Girah bhi bahut achhi lagi… Rafta Rafta sab ummedein marti hain… waah waah …Kya baat hai….

  10. bas aaNgan tukDa tukDa ho jaata hai…wah wah wah

  11. “हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है”

    बढ़िया शेर हुआ है अनिल साब ! दाद कबूलें !

  12. हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है
    बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है अनिल जी .. ये शे’र तो बहुत पसंद आया.. गिरह भी अच्छी लगी…. दाद कुबुलें

  13. बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है

    वाह!

  14. हर ज़र्रे को रोशन करके आख़िर में
    शाम ढले सूरज बूढ़ा हो जाता है

    बस तो जाते हैं घर सारे बेटों के
    बस आँगन टुकड़ा टुकड़ा हो जाता ह

    wah …kya kehne. !
    badhai kubul farmaye’n Anil ji

    Kanha

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