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T-13/11 तन्हा रह कर हासिल क्या हो जाता है-आलोक मिश्रा

तन्हा रह कर हासिल क्या हो जाता है
बस, ख़ुद से मिलना-जुलना हो जाता है

नींद को बेदारी का बोसा मिलते ही
हरा-भरा सपना पीला हो जाता है

अक्स उभरता है इक पहले आँखों में
फिर सारा मंज़र धुँधला हो जाता है

नाचने लगती हैं जब किरनों की परियाँ
चांदी-सा पानी सोना हो जाता है

…तो पलकों से ओस टपकने लगती है
शाम का सुरमा जब तीखा हो जाता है

चुभने लगता है सूरज की आँख में जो
वो दरिया इक दिन सहरा हो जाता है

अब तो ये नुस्ख़ा भी काम नहीं करता-
रो लेने से जी हल्का हो जाता है

दीवारों से बातें करने लगता हूँ
बैठे-बैठे मुझको क्या हो जाता है

ठीक कहा था उस मस्ताने जोगी ने
“ धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है “

आलोक मिश्रा 09876789610

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19 comments on “T-13/11 तन्हा रह कर हासिल क्या हो जाता है-आलोक मिश्रा

  1. aap sabhi ke is hauslafzaayi aur muhabbat se dil doguna ho gaya hai jaise ,aap sabhi ka tahedil se shukriya ..,!

  2. आलोक जी
    सारे शेर बेहतरीन

    तन्हा रह कर हासिल क्या हो जाता है
    बस, ख़ुद से मिलना-जुलना हो जाता है
    जानदार मतला

    अक्स उभरता है इक पहले आँखों में
    फिर सारा मंज़र धुँधला हो जाता है
    इस शेर पर हज़ारो दाद !!!!

    अब तो ये नुस्ख़ा भी काम नहीं करता-
    रो लेने से जी हल्का हो जाता है
    क्या उम्दा अंदाज़ है

  3. तन्हा रह कर हासिल क्या हो जाता है
    बस, ख़ुद से मिलना-जुलना हो जाता है…khoobsoorat matla
    अक्स उभरता है इक पहले आँखों में
    फिर सारा मंज़र धुँधला हो जाता है…wah wah wah, kya baat hai
    चुभने लगता है सूरज की आँख में जो
    वो दरिया इक दिन सहरा हो जाता है …bahot khoob

    अब तो ये नुस्ख़ा भी काम नहीं करता-
    रो लेने से जी हल्का हो जाता है….kya kehne, jawaab nahin

  4. alok ghazal ke darbaar me apka swagat hai.achchhi ghazal ke sath apne dastak di.. ji khush hua apki ghazal padhkar.. raaz bhai ko bhi dheron mubarakbaad .isi tarah charaagh se charagh jalta rahe aur shayri jagmagati rahe.. ye hamara farz bhi hai aur humpar qarz bhi hai….

  5. ये ग़ज़ल की दुनिया बहुत बहुत ही निराली है साहब…

  6. तन्हा रह कर हासिल क्या हो जाता है
    बस, ख़ुद से मिलना-जुलना हो जाता है
    कामयाब मतला आलोक साहब !! खुद से मिलना ज़रूरी है और तनहाई विकल्प रहे तब तक बात दीगर है लेकिन सच येहै कि तनहाई अनंतिम नियति है मनुष्य की।
    नींद को बेदारी का बोसा मिलते ही
    हरा-भरा सपना पीला हो जाता है
    यही अज़ाब है बेदार जो हुये हैं यहाँ
    उन्होंने दार पे अपना सफर तमाम किया
    …तो पलकों से ओस टपकने लगती है
    शाम का सुरमा जब तीखा हो जाता है
    मंज़र से पसमंज़र खूब बनाया है !!!
    चुभने लगता है सूरज की आँख में जो
    वो दरिया इक दिन सहरा हो जाता है
    तश्बीह लाजवाब है !! – जो ह्रदयजीवी जो दरियादिल सत्ता की आँखों में खटकने लगता है –सत्ता उसे नष्ट करने पर आमादा हो जाती है।
    सुन्दर ग़ज़ल के लिये बधाई आलोक साहब !! –मयंक

  7. pranam sir
    bahut hi khubsurat ghazal kahi hai …har ash-aar pe badhai …

    अब तो ये नुस्ख़ा भी काम नहीं करता-
    रो लेने से जी हल्का हो जाता है

    दीवारों से बातें करने लगता हूँ
    बैठे-बैठे मुझको क्या हो जाता ह

    kya kehne …

    saadar
    kanha

  8. अक्स उभरता है इक पहले आँखों में
    फिर सारा मंज़र धुँधला हो जाता है

    दीवारों से बातें करने लगता हूँ
    बैठे-बैठे मुझको क्या हो जाता है

    Alokji…. Kya achhe sher kahe hai aapne , Waah… Kya khoobsurati se nibhaya hai aapne khaalipan ko .. Waah… Bahut umda gazal..

    Dili Mubarakbaad 🙂

  9. बहुत खूब आलोक ! नींद को बेदारी का बोसा वाली बात ने दिल को छू लिया |

    पूरी ग़ज़ल के लिए खूब सारी दाद !

  10. आलोक साहब,

    स्‍वागत है आपका और धन्‍यवाद इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए…….।
    ये अश्‍आर तो मेरे साथ हो लिए बस…

    …तो पलकों से ओस टपकने लगती है
    शाम का सुरमा जब तीखा हो जाता है

    चुभने लगता है सूरज की आँख में जो
    वो दरिया इक दिन सहरा हो जाता है

    दीवारों से बातें करने लगता हूँ
    बैठे-बैठे मुझको क्या हो जाता है

    शुक्रिया।

  11. Sundar ghazal hai, Aalokji…badhaaee sweekaa keejiye

  12. आलोक यार क्या उम्दा ग़ज़ल कही है आपने! ढेरों दाद! मतला बहुत अच्छा हुआ है और इस शेर का तो कहना ही क्या:

    चुभने लगता है सूरज की आँख में जो
    वो दरिया इक दिन सहरा हो जाता है …वाह! ऐसी ही अच्छी ग़ज़लें कहते रहिये!

  13. दीवारों से बातें करने लगता हूँ
    बैठे-बैठे मुझको क्या हो जाता है

    Aalok ji, kya baat hai!!! simple and sweet yet effective!!!

  14. बढ़िया ग़ज़ल हुई है. खूबसूरत शेर हैं. गिरह भी बहुत अच्छी लगाई है.

  15. आलोक…बहुत बहुत बहुत अच्छी ग़ज़ल है… हर शे’र खूबसूरत… बेदारी का बोसा… और सपने का पीला हो जाना…. क्या ही उम्दा ख़याल है…शाम का सुरमा जब तीखा हो जाता है… बेहद उम्दा शे’र है…
    अब तो ये नुस्ख़ा भी काम नहीं करता-
    रो लेने से जी हल्का हो जाता है

    दीवारों से बातें करने लगता हूँ
    बैठे-बैठे मुझको क्या हो जाता है
    ये दो शे;र भी बेहद पसंद आये…. खूब खुश रहिये….. आप से उम्मीद बढ़ गयी है… 🙂

  16. आलोक और राज़ आप दोनों आज मेरी ख़ुशी का अंदाज़ा शायद ही कर पायें कि आपको इस अहसास से गुज़रने में अभी बहुत वक़्त है। राज़ आपके इस शागिर्द की इस ग़ज़ल से हज़रते-मुसहफ़ी के लगाये दरख़्त की शाख़ पर नया फूल खिला है। आलोक आप हज़रते-फ़ज़ल अब्बास नक़वी साहब के चौथी पीढ़ी के शागिर्द और जनाबे-कृष्ण बिहारी नूर के परपोते शागिर्द हैं। आपके आने से घराने के बुज़ुर्गों के चेहरे और आपकी बेहद उम्दा ग़ज़ल से अदब का आंगन जगमगा उठा है। जीते रहिये, बने रहिये, हमेशा ख़ुश रहिये, ख़ूब ख़ुश रहिये।

    • दादा प्रणाम –
      ,सब आपका आशीर्वाद है ,मुहब्बत है बस ,आपका मिलना खुशनसीबी है मेरी ,बहुत कुछ सीखना है अभी,गजलों के इस अनोखे और रहस्यमयी संसार में आप सभी का साथ पाना एक बेहद सुखद अहसास है !

  17. नाचने लगती हैं जब किरनों की परियाँ
    चांदी-सा पानी सोना हो जाता है
    अब तो ये नुस्ख़ा भी काम नहीं करता-
    रो लेने से जी हल्का हो जाता है
    बहुत उम्दा आलोक साहब,किरनो की परियां रोचक है ,(रोने से जी हल्का हो जाता है)सहज गद्यात्मकअभिव्यक्ति की सुंदर बानगी है
    ढेरों दाद कबूल फरमाएं

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