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T-13/9 ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है-सौरभ शेखर

ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है
उसका लहजा ज़हर-बुझा हो जाता है

रुकता है इक रहरौ पास तमाशे के
देखते-देखते इक मजमा हो जाता है

और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
ख़ाली दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है

आँखों वाले लोग ही कौन से बेहतर हैं
आँखों को भी तो धोखा हो जाता है

कुछ अच्छा करने की कोशिश में मुझसे
काम हमेशा कोई बुरा हो जाता है

क्यों अम्बर के तारे गिनने लगता हूँ
रात ढले मुझको ये क्या हो जाता है

बिखरी खुशियों को आवाज़ लगाता हूँ
ग़म का दस्ता जब यकजा हो जाता है

सूरज की वहशत बढती जाती है और
‘धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है’

‘सौरभ’ प्यार ज़माने से कुछ हासिल कर
सबको घर,गाड़ी,पैसा हो जाता है

सौरभ शेखर 09873866653

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34 comments on “T-13/9 ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है-सौरभ शेखर

  1. सौरभ भाई, फेविकोल सी मजबूत गिरह बाँधी है ……. सबसे बेहतरीन गिरह

    इस शेर के क्या कहने
    रुकता है इक रहरौ पास तमाशे के
    देखते-देखते इक मजमा हो जाता है

  2. सारी ग़ज़ल कमाल की है सौरभ भाई। बार-बार दाद कबूल करें।
    नवनीत

  3. सैकड़ों दाद बाबू साहब… बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है और खास तौर पे इस शेर के क्या कहने

    “और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
    ख़ाली दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है”

    और गाँठ भी जबरदस्त बांधी है प्यारे ! जीयो !

  4. और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
    ख़ाली दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है,,

    .kya kehne sir ..umdaa sher …speechless

  5. आँखों वाले लोग ही कौन से बेहतर हैं
    आँखों को भी तो धोखा हो जाता है

    behad sachchi aur chubhti hui sachchaaii !!!!!!

  6. Bhaiyya Pranaam,

    और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
    ख़ाली दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है

    Kya baat hai…. Yahi shikayat mujhe bhi hai… Bahut umda sher… 🙂

    सूरज की वहशत बढती जाती है और
    ‘धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है’

    Bemisaal Girah…. Waah ‘ Sooraj Ki Wahshat’ … Kya kehne….

    क्यों अम्बर के तारे गिनने लगता हूँ
    रात ढले मुझको ये क्या हो जाता है

    Kya khoobsurati se nibhaya hai aapne “emptiness of night” ko… Waah Maza aa gaya… Bahut umda sher,

    Jaun ka sher yaad aa gaya:

    Yun jo takta hai aasmaan ko tu
    Koi rehta hai aasmaan mein kya…

    बिखरी खुशियों को आवाज़ लगाता हूँ
    ग़म का दस्ता जब यकजा हो जाता है

    Saurabh Bhai… Matle se maqte tak ek behtareen gazal…. Padh kar maza aa gaya… Bahut shukria 🙂

  7. और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
    ख़ाली दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है

    आँखों वाले लोग ही कौन से बेहतर हैं
    आँखों को भी तो धोखा हो जाता है

    कुछ अच्छा करने की कोशिश में मुझसे
    काम हमेशा कोई बुरा हो जाता है

    क्यों अम्बर के तारे गिनने लगता हूँ
    रात ढले मुझको ये क्या हो जाता है

    बिखरी खुशियों को आवाज़ लगाता हूँ
    ग़म का दस्ता जब यकजा हो जाता है

    सूरज की वहशत बढती जाती है और
    ‘धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है’

    ‘सौरभ’ प्यार ज़माने से कुछ हासिल कर
    सबको घर,गाड़ी,पैसा हो जाता है…bahut hi achhi gazal huii hai saurabh bhaiya.har sher laazwaab hai .waah

  8. क्या ख़ूब मतला और कमाल के शेर कहे हैं ..बधाई सौरभ जी
    ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है
    उसका लहजा ज़हर-बुझा हो जाता है

    रुकता है इक रहरौ पास तमाशे के
    देखते-देखते इक मजमा हो जाता है

    सूरज की वहशत बढती जाती है और
    ‘धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है’

  9. अच्छी ग़ज़ल मगर गिरह बला की, उम्दा पहलू निकाल लिया। वाह,वाह

  10. सौरभ भाई

    यूँ तो पूरी ग़ज़ल अच्छी है . मतला तो बेहद खूबसूरत बन पड़ा है .
    ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है
    उसका लहजा ज़हर-बुझा हो जाता है !!!!!

  11. ताक़त का जिसको नश्शा हो जाता है
    उसका लहजा ज़हर-बुझा हो जाता है
    मतला उतरता है मन में –सच है और इस ज़मीन में आसानी से अच्छा शेर कहा है।
    और बहारों से क्या शिकवा है मुझको
    ख़ाली दिल का ज़ख्म हरा हो जाता है
    मुहब्बत से मुरौव्वत से वफा से चोट लगती है
    बिखरता फूल हूँ मुझको हवा से चोट लगती है – बशीर बद्र
    आँखों वाले लोग ही कौन से बेहतर हैं
    आँखों को भी तो धोखा हो जाता है
    नया शेर कहा है सौरभ !!! एक मेरे दोस्त है राजेश आसुदाणी –नाबीना हैं—बहुत अच्छी ग़ज़लें कहते हैं –और रंग नहीं लेकिन स्पर्श, संगीत और स्वाद पर औरों से बेहतर कहते है कदमों की आहट से जान जाते हैं कि कौन आया है – और निर्णयशक्ति हमसे उनमें बेहतर है आपका शेर उनको सुनाऊँगा –ग़ज़ल के दीगर अश आर भी अच्छे हैं – बधाई –मयंक

    • भैया आपके स्नेह के लिए आभारी हूँ..राजेश साहब के जिक्र से मन संज़ीदा हो गया..शायद कभी मिलना हो सके!

  12. आँखों वाले लोग ही कौन से बेहतर हैं
    आँखों को भी तो धोखा हो जाता है
    सौरभ’ प्यार ज़माने से कुछ हासिल कर
    सबको घर,गाड़ी,पैसा हो जाता है
    bahut khoob!

  13. बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है सौरभ भाई…
    रुकता है इक रहरौ पास तमाशे के
    देखते-देखते इक मजमा हो जाता है
    ये शेर तो बहुत उम्दा है… वाह

  14. क्यों अम्बर के तारे गिनने लगता हूँ
    रात ढले मुझको ये क्या हो जाता है
    आ .सौरभ भाई सा ,शानदार ग़ज़ल तथा सह्जप्रवाही चमत्कारी अशहार के लिए ढेरों दाद कबूल फरमाएं

  15. Saurabh,,,bahut achchhi ghazal hai, dost!

  16. बहुत अच्छी ग़ज़ल ……. शानदार गिरह लगाईं है …….
    रुकता है इक रहरौ पास तमाशे के
    देखते-देखते इक मजमा हो जाता है…ये शे’र बहुत अच्छा लगा …

  17. अच्छी ग़ज़ल हुई है सौरभ भाई…..
    रुकता है इक रहरौ पास तमाशे के
    देखते-देखते इक मजमा हो जाता है….क्या कहने……गिरह भी बहुत ख़ूब लगी है..
    दाद क़ुबूल करें.

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