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T-4/19 मेरी तहरीर जुदा कर सब से –सालिम शुजा अंसारी

मुन्दमिल नक़्श हुये फिर मेरे
शक्ल दे मुझको मुसव्विर मेरे

मेरी तहरीर जुदा कर सब से
हर्फ तश्कील हों नादिर मेरे

हो गया ज़हन मेरा खानाबदोश
हैं खयालात मुहाजिर मेरे

वुसअतें दिल की हुईं लामहदूद
दायरे हो गये कासिर मेरे

हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
आ गयी पाँव तक आखिर मेरे

करवटें वक़्त ने बदलीं ऐसे
फ़ैसले हो गये काफिर मेरे

हो गयी ज़ात मेरी नादीदा
दम बखुद रह गये नाज़िर मेरे

चल रहा हूँ मैं ज़मीं से ऊपर
नक़्श ढूँढेंगे मुसाफिर मेरे

मैं भी इक आइना-ए-फितरत हूँ
मुझमें रक़्साँ हैं अनासिर मेरे

बेखुदी मुझपे मुसल्लत ही रही
होश अब तक नहीं हाज़िर मेरे

सारा आलम है पनाहों में मिरी
फहम-ओ-इदराक हैं खातिर मेरे

एक मुद्दत से रहा मेरा वज़ूद
हाशिये पर मुतवातिर मेरे

जान पाये न अभी तक मुझको
कितने नादान हैं माहिर मेरे

टीस उठती है अभी तक “सालिम”
” ज़ख़्म गायब हैं बज़ाहिर मेरे”

सालिम शुजा अंसारी
फिरोजाबाद ( 9837659083)

————————————————

मुन्दमिल – वह घाव जो भर गया हो, पूरित
मुसव्विर – चित्रकार
नादिर – श्रेष्ठ
वुसअत – विस्तार
लामहदूद – असीम
कासिर – नाकाम
काफिर – नास्तिक [निराशावादी]
नादीदा – दृष्टि विहीन
नाज़िर – दर्शक, पर्यवेक्षक
फहम-ओ-इदराक – बुद्धि-विवेक / सूझ-बूझ
मुतवातिर – निरन्तर / लगातार

मित्रो
द्विज भाई की सलाह और दादा की आज्ञा पर मैंने अपनी समझ के अनुसार कुछ कठिन शब्दों के अर्थ पोस्ट किये हैं, यदि मेरी भूल हो तो सुधार करवाने की कृपा करें।

जो अन्य शायर चाहते हैं कि सामान्य पाठक भी उन के परिश्रम के साथ पूर्ण न्याय कर पाएँ, वो भी अपनी-अपनी पोस्ट्स में यूज किये गए कठिन अल्फ़ाज़ के सरलार्थ पेश करने की कृपा करें।

मैं समझता हूँ अब सामान्य पाठक मित्रों को इस ग़ज़ल को समझने में आसानी अवश्य होगी।

सादर
नवीन

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25 comments on “T-4/19 मेरी तहरीर जुदा कर सब से –सालिम शुजा अंसारी

  1. aap tamam hazrat ka tahe dil se shukr guzaar hoon jinhon ne meri is adna ghazal ko saraha……..agar aapki muhabbat ka mustahiq raha to zaroor haazir hota rahunga…..
    aapka …………………………….saalim shuja ansari 2.2.13

  2. SAALIM BHAI
    jitni lajwaab aapki ghazal he ..us hisaab se comments nahiN aa paye
    aisee behtreen ghazal kehna sabhi ke bas ki baat nahiN
    aapke har sher ne mujhe mutassir aur mutmayen kiya he
    aapki fikr aur parwaaz ko mera salaam
    sher quote nahiN karoonga kyunki..koi sher doosre se kam nahiN he
    lajwaabbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbb

  3. aapki taareef un logon se suni hai jo jaldi kisi ki taraf mutwajjah nahi hote,bahut umdah ghazal hai,duaaein..

  4. Lafz group par aapka swagat hai Saalim sahab……….badhiya tarhi ghazal kahi hai aapne……ye ashaar to khaas taur par pasand aaye…
    Ho ke gumrah teri rahguzar
    Aa gayi paanv tak aakhir mere

    Main bhi hoon ik aaina-e-fitrat
    Mujh mein raqsa’n hain anasir mere

    Jaan paaye na abhi tak mujhko
    Kitne nadan hain mahir mere

    Umeed karta hoon ki aapka air bhi kalaam is blog par padhne ko milega…..

  5. हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
    आ गयी पाँव तक आखिर मेरे ………….सलीम साहब बहुत अच्छा शेर कहा है

    हो गयी ज़ात मेरी नादीदा
    दम बखुद रह गये नाज़िर मेरे …………… ये भी छक्का लगा

    मैं भी इक आइना-ए-फितरत हूँ
    मुझमें रक़्साँ हैं अनासिर मेरे ………………..ये भी छक्का

    बेखुदी मुझपे मुसल्लत ही रही
    होश अब तक नहीं हाज़िर मेरे …उम्दा ज़बान। सानी मिसरा नौमश्क़ शुअरा के लिए मुहावरे के

    सहीह इस्तेमाल की राह खोल रहा है

    एक मुद्दत से रहा मेरा वुजूद
    हाशिये पर मुतवातिर मेरे …………………ये भी ज़बरदस्त शेर हुआ

    जान पाये न अभी तक मुझको
    कितने नादान हैं माहिर मेरे ………………ये शेर भी बामुहावरा लहजे की सनद बना रहा है

    टीस उठती है अभी तक “सालिम”
    ” ज़ख़्म गायब हैं बज़ाहिर मेरे” …… अच्छी गिरह . कामयाब ग़ज़ल के लिए बधाई

  6. acchi ghazal hui hai Saalim sahab… …

    हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
    आ गयी पाँव तक आखिर मेरे

    हो गयी ज़ात मेरी नादीदा
    दम बखुद रह गये नाज़िर मेरे

    ye do sher bahut pasand aaye…. dher saari mubarakbaad

  7. हो गया ज़हन मेरा खानाबदोश
    हैं खयालात मुहाजिर मेरे..wahwa!!

  8. सालिम शुजा भाई आप लफ़्ज़ वेब-पोर्टल पर पहली बार पधारे हैं, आप का सहृदय स्वागत है। तरही पर एक अच्छी ग़ज़ल पेश करने के लिये आप को दिल से बधाइयाँ। मयंक भाई ने आप के बारे में जो लिखा वह अक्षरश: सत्य प्रतीत होता है।

    मयंक भाई ने जिस पुस्तक का संकेत दिया है उस पुस्तक की अड्वान्स बुकिंग मैं हादी भाई के पास पहले से करा चुका हूँ, पब्लिश होते ही भिजवाने की कृपा करें।

  9. मुन्दमिल – वह घाव जो भर गया हो, पूरित
    मुसव्विर – चित्रकार
    नादिर – श्रेष्ठ
    वुसअत – विस्तार
    लामहदूद – असीम
    कासिर – नाकाम
    काफिर – नास्तिक [निराशावादी]
    नादीदा – दृष्टि विहीन
    नाज़िर – दर्शक, पर्यवेक्षक
    फहम-ओ-इदराक – बुद्धि-विवेक / सूझ-बूझ
    मुतवातिर – निरन्तर / लगातार

    मित्रो
    द्विज भाई की सलाह और दादा की आज्ञा पर मैंने अपनी समझ के अनुसार कुछ कठिन शब्दों के अर्थ पोस्ट किये हैं, यदि मेरी भूल हो तो सुधार करवाने की कृपा करें।

    जो अन्य शायर चाहते हैं कि सामान्य पाठक भी उन के परिश्रम के साथ पूर्ण न्याय कर पाएँ, वो भी अपनी-अपनी पोस्ट्स में यूज किये गए कठिन अल्फ़ाज़ के सरलार्थ पेश करने की कृपा करें।

    मैं समझता हूँ अब सामान्य पाठक मित्रों को इस ग़ज़ल को समझने में आसानी अवश्य होगी।

    सादर
    नवीन

  10. अच्छी ग़ज़ल हुई है सालिम साहब, ये अश’आर बेहद अच्छे लगे।

    हो गया ज़हन मेरा खानाबदोश
    हैं खयालात मुहाजिर मेरे

    हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
    आ गयी पाँव तक आखिर मेरे

    करवटें वक़्त ने बदलीं ऐसे
    फासले हो गये काफिर मेरे

    चल रहा हूँ मैं ज़मीं से ऊपर
    नक़्श ढूँढेंगे मुसाफिर मेरे

    जान पाये न अभी तक मुझको
    कितने नादान हैं माहिर मेरे

    दाद कुबूल करें।

  11. मेरी तहरीर जुदा कर सब से
    हर्फ तश्कील हों नादिर मेरे…… Wah Wah kya duaa hai !!!!

    वुसअतें दिल की हुईं लामहदूद
    दायरे हो गये कासिर मेरे….. WAH Wah… DIl ka vistaar to aseem hai lekin insaan kee seemaayen use toD deti haiN. yahi to qaid-e-hayaat hai.bahut khoob

    हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
    आ गयी पाँव तक आखिर मेरे…. achcha hai.

    करवटें वक़्त ने बदलीं ऐसे
    फ़ैसले हो गये काफिर मेरे….. bahut khoob …. waqt insaan ke faislon ko kaafir kar deta hai…. bahut umda sher.

    चल रहा हूँ मैं ज़मीं से ऊपर
    नक़्श ढूँढेंगे मुसाफिर मेरे……bahut khoob…..

    बेखुदी मुझपे मुसल्लत ही रही
    होश अब तक नहीं हाज़िर मेरे….wah wah wah bekhudi chchaai rahe to hush gum hi raheNge. lekin is bekhudi ka bhi jawab nahin.

    सारा आलम है पनाहों में मिरी
    फहम-ओ-इदराक हैं खातिर मेरे…. wahwah … vivek aur bodh arthat gyan jiske sath hon saaraa aalam uski panahon men hoga… bahut khoob.

    जान पाये न अभी तक मुझको
    कितने नादान हैं माहिर मेरे… badhiyaa

    khoobasoorat ghazal ke liye mubarakbad.

  12. MAYAN BHAI AAPKA EHSAN MAND HOON JO AAPNE MERI RASAI YAHAN TAK KI,
    AAPKI DOSTI QABILE FAKHR HE……..
    GHAZAL KE DO MISRE MISTYPE HO GAYE HEN

    मेरी तहरीर जुदा है सब से KI JAGAH (MERI TEHREER JUDA KAR SAB SE)
    फासले हो गये काफिर मेरे KI JAGAH (FAISLE HO GAYE KAAFIR MERE)

    TASHEEH FARMA DEN TO EHSAN HOGA….AAPKA……… SAALIM SHUJA ANSARI

    • YANE SHE’R YOON PADHE JAAYEN:

      मेरी तहरीर जुदा कर सबसे……MERI TAHARIR JUDA KAR SABASE
      हर्फ़ तश्कील हों नादिर मेरे…….HARF TASHKEEL HON NADIR MERE

      करवटें वक़्त ने बदलीं ऐसे……KARWATEN WAQT NE BADLIN AISSE
      फ़ैसले हो गये काफ़िर मेरे…..FAISLE HO GAYE K.AFIR MERE

      Wah Wah …. bauht khoob

  13. MAYANK BHAI , AADAB AAPKI MUHABBAT KA MEN MAQROOZ HOON, IBADAT KE SILE MEN JO CHEEZEN ATA HOTI HEN UN MEN DOSTI BHI HE, YAQEENAN AAP KI DOSTI QABILE FAKHR HE, AAP KE HUKM KI TAMEEL ME YE GHAZAL UJLAT MEN WAJOOD PAZEER HUI, TAHAM KUCHH MISTYPE HO GAYA HE…… AAP KA DHYAN RAGHIB KARAT HOON , AGAR MUMKIN HO TO TASHEEH FARMA DEN, NAWAZISH HOGI…………………………
    मेरी तहरीर जुदा है सब से MISRA YUN THA ( MERI TEHREER JUDA KAR SAB SE)
    फासले हो गये काफिर मेरे MISRA YUN THA (FAISLE HO GAYE KAFIR MERE)

  14. undoubtadly achchi ghazal hai, bas ghar pahuch kar lugat ke sath padh kar shair ke zehn ke nazadeek pahunch sakun to pura lutf aaye…………… shair ke zehn ke nazadik pahunche bina kisi bhi ghazal ka maza nahin aata…………….. mayank bhai thank you very much shuja bhai ki ghazal yahan tak lane ke liye……………

  15. behad mushkil zuban.. kaha’n hai meri urdu dic. .aam shakas k vaste is gazal me kya hai

    • हो गया ज़हन मेरा खानाबदोश
      हैं खयालात मुहाजिर मेरे
      हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
      आ गयी पाँव तक आखिर मेरे
      करवटें वक़्त ने बदलीं ऐसे
      फासले हो गये काफिर मेरे
      चल रहा हूँ मैं ज़मीं से ऊपर
      नक़्श ढूँढेंगे मुसाफिर मेरे
      जान पाये न अभी तक मुझको
      कितने नादान हैं माहिर मेरे
      टीस उठती है अभी तक “सालिम”
      ” ज़ख़्म गायब हैं बज़ाहिर मेरे”

      aadarey !! in ashaar ke liye urdu dic ki zaroorat nahin hai –remaining ashaar ke mushkil alfaaz ka meaning hum post mein likh denge ..Please encourage the Shair– regards –Mayank

      • मेरा खुद का मानना है कि — A mountain howsoever humble cannot reduce it to a molehill . हर आदमी की एक ज़बान , तर्बीयत और संस्कारगत चेतना होती है — इसी से उसकी अभिव्यक्ति या इज़हार पैदा होते हैं इनमें वो कुछ तो समझौता कर सकता है लेकिन आमूलचूल परिवर्तन महज इसलिये नहीं कर सकता कि कुछ लोगों को ऐतराज है। मेरा मकसद इस पोर्टल पर उन लोगों को आमंत्रित करना है जिनकी प्रतिभा असंन्दिग्ध है – सालिम साहब के बारे में मैं इतना जानता हूँ कि अगर समय की ज़रूरत हो तो इसी ज़मीन पर वह सबसे आसान अल्फाज़ में भी फिलबदी कह सकते हैं और इसी ज़मीन में हज़ल भी कह सकते हैं। यहाँ मैंने उनसे कहा था कि मुझे सालिम शुजा अंसारी की ग़ज़ल चाहिये — इसलिये इसमें मुम्किन है कि कुछ मुश्किल शब्द भी आ गये हों।
        जहाँ तक ग़ज़ल के फन और हुनर का सवाल है — मेरा निजी अनुभव है कि जो सामर्थ्य सालिम शुजा साहब के पास है वैसा टैलेण्ट सिर्फ ईश्वरीय वरदान के सबब ही किसी शाइर को मिलता है – आप उन्हें दिये गये नम्बर पर फोन कर सकते हैं और मेरी बात की पुष्टि कर सकते हैं –मयंक

  16. मुन्दमिल नक़्श हुये फिर मेरे
    शक्ल दे मुझको मुसव्विर मेरे…. khoobsurat sher….

    मेरी तहरीर जुदा है सब से
    हर्फ तश्कील हों नादिर मेरे….. zabardast…. bahut kamaal ka sher bhaijaan …. zindabaad….

    हो गया ज़हन मेरा खानाबदोश
    हैं खयालात मुहाजिर मेरे…….. bahut hi umdaa… waaaaaaaaaaaahh

    वुसअतें दिल की हुईं लामहदूद
    दायरे हो गये कासिर मेरे…………… bahut bahut khoob baat keh di aapne….

    हो के गुमराह तेरी राहगुज़र
    आ गयी पाँव तक आखिर मेरे…. waaaaaaaaaaaaaahh…. kya sher hua hai…. ultimate…

    करवटें वक़्त ने बदलीं ऐसे
    फासले हो गये काफिर मेरे…….UMDA…..

    हो गयी ज़ात मेरी नादीदा
    दम बखुद रह गये नाज़िर मेरे……….. kya baat kyaa baat…. bahut bahut kamaal….

    चल रहा हूँ मैं ज़मीं से ऊपर
    नक़्श ढूँढेंगे मुसाफिर मेरे…….. khoobsurat …. bahut hi khoobsurat…

    मैं भी इक आइना-ए-फितरत हूँ
    मुझमें रक़्साँ हैं अनासिर मेरे…………….. so very true….

    बेखुदी मुझपे मुसल्लत ही रही
    होश अब तक नहीं हाज़िर मेरे….. superbb …. very very superbb

    सारा आलम है पनाहों में मिरी
    फहम-ओ-इदराक हैं खातिर मेरे….. waaaaahh waaaaahh….

    एक मुद्दत से रहा मेरा वज़ूद
    हाशिये पर मुतवातिर मेरे………….. behatareen fikr….

    जान पाये न अभी तक मुझको
    कितने नादान हैं माहिर मेरे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ,,,,,, bahut khob,… bahut umdaa…. koi jawaab hi nahiN….

    टीस उठती है अभी तक “सालिम”
    ” ज़ख़्म गायब हैं बज़ाहिर मेरे” ……….. khoob khoob aur bahut khoob…

    *******************************************

    waaaah bhaijaan …. surprise …. hahahahaha… saare sher pasand aaye…. bahut hi umda gazal hui hai… dili mubaraqbaad hazir hai…

  17. aapse sehmat huN mayank awasthi sahab… bahut hi gehre fan-o-fikr ke malik hai saalim bhaijaan … aur unki shayari ka kya kehna … har sher dil me utar jate haiN…. ye hamari khushnasibi hai ki unki sarparasti me hum kuchh gazal keh paayeN … wo hamare ustaad haiN ,… guide haiN …. aur ye hamare liye bahut fakr ki baat hai….

  18. शाइर को तअर्रुफ की ज़रूरत यूँ नहीं है कि –फेसबुक इस नाम से बरसों से वाकिफ है और – उर्दू का कोई पर्चा या रिशाला इस नाम को पने इण्डेक्स में शुमार कर खुद पर नाज़ करता है — अपने देश के बाहर के पर्चों में भी सालिम साहब की रसाई ?!! पैठ है — लेकिन दो विशेष बातें इनके बारे में –पहली कि इनका एक हमजाद है जो कि फेसबुक की दुनिया में सबसे लोकप्रिय है और इसका खुलासा आने वाले दिनों में एक हार्ड बाइण्ड पुस्तक के जरिये किया जा रहा है दूसरी बात कि मेरे तरही मिसरा दिये जाने के बाद उन्होंने यह ग़ज़ल बमुश्किल 20-25 मिंनटों के भीतर भेजी है । फिलबदी सालिम साहब बायें हाथ का खेल है- मैं उनका इस अप्रतिम और विलक्षण प्रतिभा के कारन सदा से अनन्य प्रशंसक रहा हूँ –और वो बहुत हस्सास तबीयत इंसान भी है — इस गज़ल पर तब्सरा बाद में -मयंक

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