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आईने शीशे हो गये – नवीन

सब दर्जे वाले हो गए
यानी हम ओछे हो गए

एक बड़ा सा था दालान
अब तो कई कमरे हो गये

सबको अलहदा रहना था
देख लो घर मँहगे हो गए

झरने बन गए तेज़ नदी
राहों में गड्ढे हो गए

अज्म था बढ़ते रहने का
सब पैदल घोड़े हो गए

हर तिल में दिखता है ताड़
हम कितने बौने हो गए

इतने साल कहाँ थे तुम
आईने शीशे हो गये

बेटे आ गए काँधों तक
कुछ बोझे हल्के हो गए

दिखते नहीं माँ के आँसू
हम सचमुच अंधे हो गए

गिनने बैठे करम उसके
पोरों में छाले हो गए

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

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About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

12 comments on “आईने शीशे हो गये – नवीन

  1. इतने साल कहाँ थे तुम
    आईने शीशे हो गये

    ……लाज़वाब ! हरेक शेर जीवन का सटीक चित्रण…बेहतरीन गज़ल…

  2. बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है नवीन भाई…जियो…आईने शीशे हो गए तो ऐसा मिसरा है जो सीधे ऊपर से उतरा लगता है…ऐसे चौंकाने वाले मिसरे यूँ ही ज़ेहन में नहीं आते…उसकी मेहरबानी से ही आते हैं…”हम कितने बौने हो गए” भी कमाल का शेर बन पड़ा है…ढेरों दाद कबूल करें…

    नीरज

    • बड़े भाई प्रणाम। प्राइमरी वाले दौर से ही आप तो कंधे पर बैठाकर मुझे बड़ा बताते आ रहे हैं भाईसाब। बहुत बहुत आभार। जैसा आप ने कहा है, ये मिसरा वाक़ई उसकी तरफ़ से मेरे मारफ़त कहलवा दिया गया है बस………….. जय माँ शारदे!

  3. खूबसूरत ग़ज़ल है नवीन जी, ये महानगरीय जीवन का आइना है। आप जैसे लोग जब तक लिख रहे हैं साहित्य का आइना शीशा नहीं होगा इसका मुझे विश्वास है। बधाई स्वीकारें।

    • धर्मेन्द्र भाई आप से मिलने वाला निरंतर उत्साहवर्धन बहुत हिम्मत देता है| भाइयों का स्नेह बड़ा संबल होता है|

      दालान और कमरे वाले शेर को एक बड़े साम्राज्य के – पहले कुछ राष्ट्रों और फिर – प्रदेशों में विघटित होने जैसे सन्दर्भों में पढने की कृपा करें|

  4. इतने साल कहाँ थे तुम
    आईने शीशे हो गये—- नवीन भाई !! बालू से तेल निकाल दिया आपने !! आइने के शीशा हो जाने की बात क्या खूब सूझी !! बहुत खूब !! बहुत खूब !! ग़ज़ल जी हुई ग़ज़ल है ! !धंसकते जीवन मूल्य !! बिखरती सम्वेदनायें और टूटती उमीदें –बहुत सुन्दर अल्फाज़ दिये है अहसास को !! —मयंक

    • आ. मयंक भाई साब आप का आशीर्वाद और नई ज़वाबदारियों का एहसास करा रहा है

      जैसा कि अपनी बात हुई, गुजिश्ता दिनों आईने को ले कर चन्द ख़यालात कलमबद्ध हुए हैं, उस रस्साकशी के दौरान ही सिर्फ़ एक मिसरा भर बना था – आईने शीशे हो गए – सुनते ही तुफ़ैल जी ने हुक्म दिया कि ग़ज़ल पूरी करो| कुछ शेर होने के बाद काम बीच में ही रुक गया| आत्म संतुष्टि नहीं मिल रही थी| इस शेर को जब कल्याण के मुशायरे में सुनाया, और लोगों को चौंकते हुए देखा तो फिर से काम शुरू किया| गुरुदेव से इस्लाह के बाद ग़ज़ल आप लोगों के समक्ष है|
      आप लोगों ने पसंद किया, ये मेरी ख़ुशक़िस्मती है

  5. सबको अलहदा रहना था
    देख लो घर मँहगे हो गए

    bade bhai bahut hi accha she’r hai… aaj ke samay kee soch ko dikhata hua umda she’r

    हर तिल में दिखता है ताड़
    हम कितने बौने हो ग
    kya baat hai..

    kaafi acchi ghazal hai..lekin in do she’ron par khaas daad qubul kariye..

    sadar

  6. -कुछ अपना कुछ औरों का एहसास मेरी ग़ज़लों में है

    -जो भी देखा, सुना, जिया, सोचा। ख़ुद-ब-ख़ुद शेर में ढला पाया।।

    ज़िंदगी कितने ही मंज़र हर लम्हा दिखलाती रहती है, उन में से कुछ ही हमारे बयान के नज़दीक पहुँच पाते हैं। और जब आप जैसे मार्गदर्शक का साथ मिल जाये – तो वो सोने पे सुहागा जैसा हो जाता है।

    अब तक सिर्फ़ एक ही बंदे को आईने-शीशे वाले शेर को समझने में असमर्थ पाया है, उस के अलावा अब तक दर्ज़न भर से अधिक अग्रज बाक़ायदा पीठ थपथपा चुके हैं, और ये बड़ों के आशीर्वाद से ही संभव हुआ है गुरुदेव।

  7. छोटे शहरों से दाने-पानी की तलाश में महानगर पहुंचना सुखद भविष्य तो देता है मगेर पीड़ादायक अतीत भी साथ कर देता है. ये ग़ज़ल अपने आपको खोजती तोड़ती, मरोड़ती ज़िदगी की कहानी सी है. घर-आंगन की कहानी.
    किसी का विकास तो किसी का पिछड़ जाना, घर का एक इकाई से कई हिस्सों में बंटना, एकल परिवार की तकलीफ़, बच्चों के बड़ा होने पर खुश होती ज़िदगी, मगर आगे बढ़ने की आपा-धापी में अविश्वास का फैलता जाल कि सामान्य बात भी संदेहास्पद लगे, वक़्त झुर्रियों की शक्ल में शीशे पर दास्तान लिखता हुआ. इरफान सिद्दीकी जी का एक शेर यद् आ रहा है
    एक लड़का शहर की रौनक में सब कुछ भूल जाय
    एक बुढ़िया रोज़ चौखट पर दिया रौशन करे

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