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कुछ शेर क्यों प्रसिद्ध हैं ?!! –एक तफ़्तीश

बहुत से शेर बहुत प्रसिद्ध हैं आप तलाश करें तो पायेंगे कि बहुत दूर तक जाने की और बहुत लम्बे अर्से बने की क्षमता इसीलिये है कि उनमें वो तत्व हैं जो शाश्वत हैं और और शिल्प और भाव उनमें इस खूबसूरती से पिरोये गये हैं कि वो प्रतिनिधि शेर बन गये – हमेशा नये और ताज़ा रहते हैं – ये शेर समूचे दीवान के बराबर होते हैं – दोस्तो !! आप भी किसी ऐसे शेर को कारण सहित क़्वोट कर सकते हैं जिससे पढने वालो को बेहतर जानकारी हसिल हो – यहाँ हम कुछ शेरों पर चर्चा करेंगे – किस कारण वो इतने पसन्द किये गये ॥

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा -1 ( इकबाल )

अल्लामा इकबाल का यह शेर क्यों इतना प्रसिद्ध है इसके लिये इस शेर की गहराई में उतरना होगा – नर्गिस अपनी बेनूरी ( अन्धेपन , दृष्टिहीनता ) पर हज़ारों बरस रोती है –चमन में दीदावर या दृष्टा बड़ी मुश्किल से जन्म लेता है । बेनूरी का अर्थ विस्तृत कीजिये यह बांझपन या अनुर्वरता की ओर संकेत करता है । हज़ारों साल अव्यावहारिक नहीं है— नर्गिस को सिम्बल ले कर लम्बे कालख़ंड की बात के जा रही है कि जैसे एक समाज की ज़िन्दगी की पीड़ा जब घनीभूत हो जाती है तब उसमें एक युगदृष्टा का जन्म होता है – गौरतलब है कि नर्गिस का फूल देर में आता है और वह देखने में किसी आँख जैसा लगता है । यही इस शेर की खूबसूरती है ।
आप गीता के प्रसिद्ध श्लोक को याद कीजिये –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत –

वहाँ भी योगेश्वर यही कह रहे हैं कि जब जब धर्म की हनि और अधर्म का उत्थान होता है धर्म की पुनर्स्थापना केलिये मैं स्वयं को रचता हूँ – यह श्लोक खुद दीदावर का है और इकबाल का शेर दिग्दर्शक का शेर है –लेकिन मर्क़ज़े-खयाल काफी नज़दीक है ।आप भी अपना मत दे सकते हैं।

क़फ़स में मुझसे रूदादे -चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिसपे कल बिजली वो मेरा आशियाँ क्यों हो -2 ( ग़ालिब )

दो चिड़ियों में से एक पिंजरे में है और दूसरी उसको चमन का हाल बताने आयी है – पहली कहती है कि कल चमन में बिजली गिरी – दूसरी संशयग्रस्त हो कर कहती है – तू मुझसे चमन की कहानी कहते डर मत – जिसपर कल बिजली गिरी है वो मेरा आशियाँ मेरा घोंसला क्यों हो । जब अपशकुन की आशंका हमारे दिल में होती है तो किसी घटना या समाचार में हम अश्वस्त होने के लिये स्वयं अपने को ढाढस बँटाने के लिये जो उपक्रम करते हैं उसका बहुत खूबसूरत चित्र है यह — अब तारीख़ में जाइये – बहादुर शाह “ ज़फर” अंग्रेज़ों की कैद में हैं और हरकारा उनको यह बताने गया है कि कल दिल्ली गेट पर दोनो शाहज़ादों को अंगेज़ों ने गोली मार दी है।

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता -3 ( मोमिन )

तस्व्वुफ में पिरोया हुआ इश्क़े –हक़ीक़ी , इश्क़े मजाज़ी का ऐसा शेर दूसरा नही कहा जा सकता । प्रेम की इंतेहा ईश्वरीय या दैवी अनुभूति है –यह अनल हक़ या अहंब्रम्हास्मि जैसा अनुभव दे या तत्वमसि जैसा लेकिन प्रेम की साँकरी गली में दो कभी नहीं होते – कतरा समन्दर से मिलने के बाद फना हो जाता है – महबूब का सामीप्य जैसे कि कोई दूसरा नहीं है अब इस दुनिया में – सिर्फ तुम ही तुम हो — मैं भी नहीं — मैं तिरोहित हो चुका हूँ । इस शेर पर ग़ालिब मोमिन को अपना पूरा दीवान देने को तैयार थे ।

फसीले- जिस्म पे ताज़ा लहू के छींटे हैं
हुदूदे-वक्त से आगे निकल गया है कोई -4 ( शिकेब )

शिकेब ने खुदकुशी से पहले इसका अदबी इज़हार इस शेर में कर दिया था – जिस्म ही वो दीवार है जो हमें समय की परिधियों में बाँधता है –यहाँ वक़्त का खंजर हमेशा हमारी तलाश में रहता है – किसी के बदन की दीवार पर ताज़ा लहू के छींटे यह बता रहे हैं कि वह समय की हदों से आगे चला गया है – बाद में शिकेब ने ट्रेन से कट कर आत्महत्या कर ली थी ।

प्रस्तुति – लफ्ज़ ऐडमिन

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7 comments on “कुछ शेर क्यों प्रसिद्ध हैं ?!! –एक तफ़्तीश

  1. बहुत सुंदर विचार हैं।
    उधर तो सैयाद की ये जिद है, चमन में कोई कदम न रक्खे,
    इधर हमारे यही इरादे बनाऐं गुलशन में आशियाना।

  2. sher kaise samjha jaaye… kaise padha jaaye..iski baangi hai ye post… jis din is tarh padhne gunne kee samjh viksit ho jayegi..tab lagega ki kuch padha hai..

  3. आवाज़ शर्मा जी !! नेपाली तो हमारे सिक्किम राज्य की राजभाषा और संविधान सम्मत भाषा है – यह पश्चिम बंगाल और असम की भी लोकप्रिय भाषा है — अवधी और भोजपुरी के बहुत निकट की भाषा है — कोई समस्या नहीं है आपका स्वागत है !!!

  4. बहुत खूब । शेर की ताकत को परख रहा हूँ ।

    सिकारू हूँ, लिख नहीँ सकता हिन्दीमेँ । नेपाली मेँ लिखने का कोशिष करता हूँ । बे-बह्र गजल मुझे पसन्द नहीँ ।
    आप लोगोँ कि सान्निध्य मेँ बहुत कुछ सिखने की ख्वाहिस है ।

  5. सुलभ !! यह पड़ताल –प्रकाश पण्डित , फिराक गोरख़पुरी , नरेन्द्र नाथ के बयानो या उनके द्वारा सम्पादित पुसतकों पर आधारित है — कफस में मुझसे रूदादे -चमन……. –यह व्याख्या फिराक़ साहब की है — शुक्रिया !!

  6. ये तफ्तीश बहुआयामी है.

  7. शेर की आत्मा की गहराई तक, कल्पना की रस्सी पकड़ कर उतरे बिना, और फिर उस तर्क को आत्मसात किये बिना; किसी शेर का उचित आकलन वैसे भी दुष्कर काम है। बहुत अच्छी पोस्ट। आप के पास उम्दा कलेक्शन है।

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